दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -157 जहां लोभ हो, वहां ईश्वर नहीं बसता : लोभ और भक्ति एक साथ नहीं टिक सकते


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 157वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


कलि का स्वामी लोभीया, मनसा घरी बधाई।

देहि पईसा ब्याज को, लिखां करता जाई॥


यह दोहा कलियुग की उस सच्चाई की ओर संकेत करता है,

जहाँ मानव हृदय से दया, धर्म और आत्मबोध लुप्त होते जा रहे हैं।

कबीर कहते हैं —

जब कोई व्यक्ति लोभ का स्वामी बन जाता है,

तो वह ईश्वर से दूर हो जाता है,

क्योंकि लोभ और भक्ति एक साथ नहीं टिक सकते।

 

जहाँ लोभ, लालच और भौतिक लालसा का बोलबाला हो —

वहाँ आत्मा की शांति और ईश्वर की अनुभूति संभव नहीं।

यह दोहा एक तीखा सामाजिक व्यंग्य है —

आज समाज में धन के स्वामी लोभी सूदखोर बन गए हैं,

जो गरीबों को अपने स्वार्थ के अनुसार कर्ज में बाँध देते हैं,

और उस पर मनमाना ब्याज जोड़कर उन्हें आजीवन दास बना लेते हैं।

 

बिना संवेदना, बिना विवेक,

केवल लाभ कमाने की व्यवस्था बन गई है।

जब समाज का आधार लोभ बन जाए,

तो उसमें मानवता, दया और करुणा का स्थान नहीं रह जाता।

यह दोहा एक गंभीर चेतावनी है —

यदि समाज और व्यक्ति केवल धन और लोभ के पीछे भागते रहेंगे,

तो वे नैतिक और आत्मिक पतन की ओर बढ़ते जाएंगे।

कबीर अंत में स्पष्ट रूप से कहते हैं —

जहां न्याय, दया और धर्म की जगह लोभ और सूद ले लें,

वहाँ सच्चा ईश्वर नहीं बस सकता।

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