तीर्थराज सम्मेदशिखर जी की पुण्यभूमि में ऐतिहासिक चातुर्मास और तप की चरम साधना पूर्ण करने के बाद, जैन धर्म के प्रखर चिंतक और दिगंबर परंपरा के तेजस्वी संत आचार्य श्री प्रसन्नसागर जी महाराज ने हजारों किलोमीटर की पदयात्रा पूर्ण कर बद्रीनाथ में भगवान आदिनाथ की निर्वाण स्थली का दर्शन किया। यात्रा के अगले चरण में उनका आगमन हरिद्वार स्थित पतंजलि विश्वविद्यालय में हुआ। पढ़िए राजकुमार जैन अजमेरा की विशेष रिपोर्ट…
हरिद्वार/कोडरमा (झारखंड)। तीर्थराज सम्मेदशिखर जी की पुण्यभूमि में ऐतिहासिक चातुर्मास और तप की चरम साधना पूर्ण करने के बाद, जैन धर्म के प्रखर चिंतक और दिगंबर परंपरा के तेजस्वी संत आचार्य श्री प्रसन्नसागर जी महाराज ने झारखंड, महाराष्ट्र, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश होते हुए हजारों किलोमीटर की पदयात्रा पूर्ण कर बद्रीनाथ में भगवान आदिनाथ की निर्वाण स्थली का दर्शन किया।
यात्रा के अगले चरण में उनका आगमन हरिद्वार स्थित पतंजलि विश्वविद्यालय में हुआ, जहां स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने उनका अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ स्वागत किया। यह अवसर आध्यात्मिक, दार्शनिक और धार्मिक संवाद का एक अनुपम दृश्य बन गया।
गर्मी और कठिनाई के बावजूद तपस्वी संन्यासी का भारत भ्रम
स्वामी रामदेव जी ने इस अवसर पर कहा, “यह हमारे पतंजलि परिवार का सौभाग्य है कि गुरुदेव के चरण यहाँ पड़े हैं। जैन संत इस भीषण गर्मी में भी नंगे पैर पूरे भारत में पदयात्रा करते हैं। यह त्याग और तपस्या की पराकाष्ठा है।”
जैन मुनि ने योग-आयुर्वेद की प्रशंसा की
इस अवसर पर आचार्य प्रसन्नसागर जी महाराज ने कहा, “स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण मानवता, स्वास्थ्य, सामाजिक समृद्धि और वैश्विक सद्भाव के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं। उन्होंने ऋषियों की परंपरा में प्रकृति, संस्कृति और विकृति का समन्वय समझाया है।”
उन्होंने आगे कहा,
“यदि जीवन प्रकृति और संस्कृति के अनुरूप नहीं है तो विकृति में जीना ही दरिद्रता है।”
“जैन धर्म, सनातन का शुद्धतम रूप” — स्वामी रामदेव
स्वागत समारोह में बोलते हुए स्वामी रामदेव ने कहा, “आचार्य प्रसन्नसागर जी का आगमन केवल एक जैन संत का आगमन नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन की शुद्धतम चेतना का प्रकटीकरण है। जैन धर्म तप, संयम, अहिंसा और आत्म-जागरूकता का मार्ग है। आचार्यश्री का जीवन विनम्रता, धैर्य और संयम की मिसाल है। दिगंबर बनना केवल वस्त्र त्याग नहीं, बल्कि समस्त भ्रमों का त्याग है।”
संस्कृत में गूंजे श्लोक, भावविभोर हुआ मंच
पंतजलि विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य बालकृष्ण ने आचार्यश्री के प्रति आभार प्रकट करते हुए संस्कृत में रचित आठ श्लोकों का वाचन किया। यह काव्यात्मक श्रद्धांजलि श्रोताओं के हृदय को छू गई और हॉल में भक्ति की तरंगें भर गईं।
सम्मान और कृतज्ञता के पल
इस अवसर पर जैन समुदाय की ओर से स्वामी रामदेव को प्रशंसा पत्र भेंट किया गया। कार्यक्रम में मनीष जैन भिड़, प्रदीप जैन (कानपुर), मनोज चौधरी (हैदराबाद), विवेक जैन (कोलकाता), शिवम सोनी, विकल्प सेठी, गणेश भाई, सत्यम जैन, डॉ. जैन, सुमित जैन समेत हजारों श्रद्धालु उपस्थित थे।
दिल्ली में 8 जून को होगा भव्य मंगल प्रवेश
हरिद्वार में संपन्न इस आध्यात्मिक मिलन के बाद आचार्यश्री का भव्य मंगल प्रवेश 8 जून को भारत की राजधानी दिल्ली में प्रस्तावित है, जिसकी तैयारियों में दिल्ली जैन समाज पूरी निष्ठा से जुटा हुआ है।













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