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कहानी उत्तम तप धर्म की : आत्मा की मुक्ति के लिए किया जाता है उत्तम तप


उत्तम तप का अर्थ होता है श्रेष्ठ तपस्या या ध्यान। तपस्या एक धार्मिक और आध्यात्मिक प्रथा है जिसमें व्यक्ति अपने आत्मिक विकास के लिए कठिन साधनाएं और संयम रखता है। आज पढ़िए उत्तम तप धर्म की कहानी…


बात धार्मिक नगरी उज्जैयनी की है। वहां एक राजा थे। उनके दो बेटे थे भर्तृहरि और शुभ चंद्र। एक दिन दोनों तपस्या करने चले गए। भर्तृहरि एक मंत्र-तंत्र वाले तपस्वी के पास गए और शुभ चंद्र ने एक परमपूज्य दिगम्बर मुनिराज की शरण ली। दोनों को तपस्या करते करते 12 वर्ष बीत गए। एक दिन भर्तृहरि ने तपस्या से किसी भी वस्तु को सोने में बदलने वाला विशेष तरल अर्जित किया। उस तरल को वे अपने भाई शुभ चंद्र के साथ साझा करना चाहते थे। उन्होंने अपने अनुयायी को शुभ चंद्रजी के पास भेजा, लेकिन शुभ चंद्रजी महाराज ने उसे लौटा दिया। अनुयायी ने वापस आकर भर्तृहरि को सारी बात बताई।

इसके बाद भर्तृहरि स्वयं अपने भाई से मिलने गए और कहा- भाई यह कोई साधारण तरल नहीं है। मैंने 12 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद इसे हासिल किया है। शुभ चंद्र महाराज ने पूछा- क्या ये आपकी तपस्या का फल है? शुभ चंद्रजी ने अपने पैरों के पास से कुछ मिट्टी ली और उसे चट्टान पर फेंक दिया। वह पूरी बड़ी चट्टान सोने में बदल गई। इससे भर्तृहरि चौंक गए। वह शुभ चंद्र महाराज के पैरों पर गिर गए और कहा कि मैंने अपनी मूर्खता व अज्ञानता के कारण आपके तप के महत्व को नहीं समझा। झूठी तपस्या में पड़कर मैंने बहुत पाप कमाए हैं।

अब आप ही मुझे उत्तम तप का रास्ता दिखाएं। इसके बाद भर्तृहरि ने भी अपने भाई शुभ चंद्रजी महाराज की तरह ही दिगंबरी दीक्षा ली। इसका अर्थ है कि उत्तम तप वह नहीं होता, जिससे सांसारिक सुखों को अर्जित करने के लिए जाना जाता है। उत्तम तप सांसारिक दुःख से छुटकारा पाने के लिए है और आत्मा की मुक्ति के लिए किया जाता है ।

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