जिन सिद्ध परमात्मा की हम लोग आज आराधना कर रहे हैं। वह भी कभी संसार चक्र में ही फंसे हुए थे। उन्होंने इस संसार चक्र को भेदा और सिद्धचक्र में अपना स्थान बना लिया। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने अष्टान्हिका महापर्व के तहत व्यक्त किए। भोपाल से पढ़िए, यह खबर…
भोपाल। जिन सिद्ध परमात्मा की हम लोग आज आराधना कर रहे हैं। वह भी कभी संसार चक्र में ही फंसे हुए थे। उन्होंने इस संसार चक्र को भेदा और सिद्धचक्र में अपना स्थान बना लिया। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने अष्टान्हिका महापर्व के तहत व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सांसारिक प्राणिओं में शुभ और अशुभ परिणाम निरंतर होते रहते हैं। उन परिणामों से ही कर्मबंध होकर नए-नए शरीर की प्राप्ति होती रहती है तथा मन विषयों में रमकर राग द्वेष की उत्पत्ति करता है। जिससे जन्म मरण का यह चक्र निरंतर चलता रहता है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि 31 अक्टूबर को दोपहर 1.30 बजे से एमए सिटी (मेनिट) महाविधालय में युवा शक्ति को आत्म जाग्रति की ओर दिशा बोध कराते हुए संबोधन होगा।
जिससे वह अपने भविष्य को तय कर सकें तथा मुनिश्री का 3 बजे मंगल विहार श्री नेमीनाथ दिगंबर जैन झिरनो मंदिर की ओर होगा तथा सांयकालीन शंका समाधान एवं रात्रि विश्राम होकर 1 नवंबर शनिवार को भगवान का मस्तकाभिषेक एवं शांतिधारा तथा श्री गणधर वलय विधान होगा एवं आहार चर्या होगी।













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