दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 141वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“ज्यों नैनन में पूतली, त्यों मालिक घर माहिं।
मूर्ख लोग न जानिए, बहर ढूंढते जाहिं॥”
कबीर दास जी इस दोहे में बताते हैं कि जिस प्रकार नेत्रों की पुतली आंखों के भीतर होती है और दृष्टि का स्रोत होती है,
ठीक उसी प्रकार ईश्वर (मालिक) भी हमारे भीतर ही वास करता है।
लेकिन अज्ञानवश लोग उसे बाहर — तीर्थों, मंदिरों और अन्य स्थानों में खोजते रहते हैं,
जबकि वह तो हर जीव के अंदर ही विद्यमान है।
कबीर यह स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर कोई बाहरी सत्ता नहीं है,
बल्कि वह हमारे हृदय, आत्मा और चेतना में ही समाया हुआ है।
जैसे पुतली के बिना आंख देख नहीं सकती,
वैसे ही ईश्वर हमारे भीतर का वह चेतन तत्त्व है, जिसके बिना जीवन की कोई गति नहीं।
यह दोहा उन लोगों के लिए आईना है जो बाहर की दुनिया को बदलना चाहते हैं,
लेकिन स्वयं को बदलने की आवश्यकता नहीं समझते।
ईश्वर की प्राप्ति के लिए किसी विशेष स्थान या वस्त्र की आवश्यकता नहीं,
बल्कि जरूरी है —
स्वयं की शुद्धता, सच्चा मन और प्रेमभाव।
अक्सर लोग कठिनाइयों में बाहरी सहारा ढूंढते हैं,
जबकि सच्चा समाधान तो उनकी अपनी आंतरिक शक्ति और चेतना में छिपा होता है।
यदि हम अपने मन, विचार और कर्म को शुद्ध कर लें,
तो ईश्वर, शांति और समाधान — ये सभी हमारे भीतर से ही प्राप्त हो सकते हैं।
जिस प्रकार आँखों की रोशनी पुतली के भीतर होती है,
उसी प्रकार परमात्मा भी हमारे हृदय में निवास करता है।
उसे बाहर खोजना अज्ञानता है।
सच्ची भक्ति — स्वयं को जानने, स्वीकारने और शुद्ध करने में है।













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