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भगवान राग और द्वेष से रहित वीतरागी हितोपदेशी होते हैं : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में दी देशना


रत्न स्वर्ण के समवशरण में विराजित भगवान के पुण्य प्रताप से पाषाण के मान स्तंभ को देखकर मान-अभिमान गलित नष्ट हो जाता है। यह धर्म देशना संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रगट की। टोंक से पढ़िए, यह खबर…


टोंक। समवशरण में विराजित भगवान वीतरागी सर्वज्ञ और हितोपदेसी हैं। उन्हें राग द्वेष नहीं होता है। उनकी दिव्य देशना को तीन गति के जीव 12 कक्ष में बैठकर दिव्य देशना का श्रवण करते हैं। रत्न स्वर्ण के समवशरण में विराजित भगवान के पुण्य प्रताप से पाषाण के मान स्तंभ को देखकर मान-अभिमान गलित नष्ट हो जाता है। यह धर्म देशना संघ सहित विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रगट की।

राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा कि संसारी प्राणी राग द्वेष में डूबे हैं। संसार रूपी भव समुद्र से जिनालय में विराजित भगवान सद राह दिखाते हैं क्योंकि, पंच कल्याणक में धार्मिक क्रियाओं सूरी मंत्रों से प्रतिमाओं में भगवान के गुणों का आरोपण कर उन्हे पूज्य बनाया जाता हैं। ज्येष्ठा और श्रेष्ठता मानने से नहीं गुणों से होती है।

मुनिचर्या का आदर्श प्रस्तुत किया

20 वीं सदी में नवरत्न के रूप में प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी हुए जिन्होंने जिनालय में भी विजातीय प्रवेश के विरोध में 1105 दिनों तक अन्न आहार का त्याग कर अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। महापुरुष हमेशा उपकार करते हैं। आचार्य श्री शांति सागर जी ने मुनिचर्या का निर्दोष पालन कर आदर्श प्रस्तुत किया।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने सभी को छोटे-छोटे नियम व्रत त्याग से जीवन को उत्कृष्ट और मंगलमय बनाने का आशीर्वाद दिया।

भक्ति की शक्ति से मुक्ति मिलती है

आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी ने उपदेश में परमात्मा के गुण बताकर कहा कि भक्ति की शक्ति से मुक्ति मिलती है। रमेश काला एवं समाज प्रवक्ता पवन एवं विकास जागीरदार ने बताया कि शनिवार को दीप प्रवज्लन के बाद आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन ओर जिनवाणी भेंट के बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की विशेष अष्ट मंगल द्रव्य से पूजन करने का सौभाग्य श्री वर्धमान महिला मंडल काफला बाजार टोंक के समस्त श्रावक श्राविकाओं को प्राप्त हुआ।

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