समाचार

दोहों का रहस्य -38 संग्रह की मानसिकता व्यक्ति के जीवन में नकारात्मकता भर देती है : दान करने से व्यक्ति मुक्त होता है अपने लोभ, मोह और स्वार्थ से 


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की अड़तीसवीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


दान दिए धन न घटे, नदी के घटे नीर।

अपनी आँखों देख लो, यूं क्या कहें कबीर।।

कबीर दास जी इस दोहे के माध्यम से हमें यह समझाना चाहते हैं कि सच्ची संपत्ति केवल भौतिक धन नहीं, बल्कि परोपकार, सेवा और दान की प्रवृत्ति में निहित होती है। मनुष्य अक्सर इस भ्रांति में जीता है कि दान करने से उसका धन कम हो जाएगा, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। जैसे नदी का पानी जितना बहता है, उतना ही शुद्ध और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है, वैसे ही जब कोई व्यक्ति दान करता है, तो उसकी आंतरिक और बाह्य संपत्ति बढ़ती है।

 

दान करने से व्यक्ति अपने लोभ, मोह और स्वार्थ से मुक्त होता है। धन और संपत्ति का वास्तविक उद्देश्य केवल अपने लिए संग्रह करना नहीं है, बल्कि उसका सही उपयोग जरूरतमंदों की सहायता में है। यदि हम केवल संचय करते रहेंगे और उसे उपयोग में नहीं लाएंगे, तो वह धन भी व्यर्थ हो जाएगा, ठीक वैसे ही जैसे रुका हुआ पानी सड़ जाता है।

 

कबीर जी इस दोहे में केवल आर्थिक दान की बात नहीं कर रहे, बल्कि वे हमें एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान कर रहे हैं कि जीवन में उदारता और परोपकार का क्या महत्व है। दान केवल भौतिक नहीं, बल्कि आत्मिक और भावनात्मक रूप से भी किया जा सकता है। प्रेम, ज्ञान, समय और सहायता का दान भी उतना ही मूल्यवान है।

 

इसलिए, यदि हम अपने जीवन में सच्ची समृद्धि चाहते हैं, तो हमें संकीर्णता और लोभ से ऊपर उठकर परोपकार और उदारता का मार्ग अपनाना चाहिए। जो व्यक्ति देता है, वही असल में सबसे धनी होता है। यह दोहा कर्म के सिद्धांत को भी उजागर करता है—”जो दोगे, वही लौटकर आएगा।”

 

जब हम दूसरों के कल्याण के लिए अपना धन, समय या ऊर्जा लगाते हैं, तो ब्रह्मांड किसी न किसी रूप में हमें उसका प्रतिफल देता है। यह प्रकृति का नियम है कि प्रवाह ही शुद्धि और प्रगति लाता है; रुका हुआ पानी सड़ जाता है, वैसे ही संग्रह की मानसिकता व्यक्ति के जीवन में नकारात्मकता भर देती है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
4
+1
1
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page