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अपने मन को धार्मिक आजादी दें स्वच्छंद न बनाएं : आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने प्रवचन में दी धर्म देशना 


आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज यहां अपने प्रवचनों से सभी जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को जीवनोपयोगी संदेशों का रसपान करवा रहे हैं। उनके प्रवचन से सभी धर्मलाभ अर्जित कर रहे हैं। आचार्यश्री विमर्शसागर जी ने कहा कि अपने जीवन को सुंदर बनाने के लिए अपने मन को आज़ाद करना होगा। खतौली से पढ़िए, सोनम जैन की यह खबर…


खतौली। आचार्यश्री विमर्शसागर जी महाराज यहां अपने प्रवचनों से सभी जैन समाज के श्रावक-श्राविकाओं को जीवनोपयोगी संदेशों का रसपान करवा रहे हैं। उनके प्रवचन से सभी धर्मलाभ अर्जित कर रहे हैं। आचार्यश्री विमर्शसागर जी ने कहा कि अपने जीवन को सुंदर बनाने के लिए अपने मन को आज़ाद करना होगा। आप कहोगे कि गुरुदेव मन तो हमारा वैसे ही आजाद है, उसे क्या आजादी देनी? ध्यान रहे, आपका मन आज़ाद नहीं है, आपका मन स्वच्छंद है। आपका मन स्वच्छंद है पंचेन्द्रियों के पापवर्द्धक विषयों में। आपका मन स्वच्छंद है मन-वचन- काय की उद्दंडताओं में। आपका मन स्वच्छंद है पापों में एवं व्यसनों में। यह स्वच्छंदता आपकी असली आजादी नहीं है।उन्होंने आगे कहा कि वास्तविक आजादी वह है जहां आप धर्म कार्य करने के लिए स्वतंत्र हो।

अभी तो आप धर्म-अनुष्ठान भी परतंत्रता में करते हैं। यदि आपका मन अधिक समय मंदिर आदि धर्म स्थानों में लगने लग जाए तो परिवार के द्वारा आपके ऊपर प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं। बन्धुओ ! जागना होगा, कब तक आप स्वच्छंदता को ही आज़ादी मानते रहोगे। आज़ादी का यह भ्रम आपको पतन मार्ग की ओर बढ़ा रहा है।

कर्तव्य पथ पर चलना मन की आज़ादी है। अहिंसा, सत्य, अन्चौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि व्रत भावना रूप चिन्तन के लिए मन को स्वतंत्र कर देना मन की आज़ादी है। धार्मिक चिन्तन में मन स्वतंत्रता प्राप्त करे वही मन की सन्च्ची आज़ादी है। अपने मन को धार्मिक आजादी प्रदान करें। जीवन को खुशहाल बनाने के लिए मन को तीर्थ बनाना होगा । आपका मन तब ही तीर्थ बनेगा जब आप अपने मन को धार्मिक आज़ादी प्रदान करेंगे।

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