दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -148 आज के समाज में जब रिश्ते क्षणिक, प्रेम स्वार्थी, और धर्म आडंबर बनते जा रहे हैं : जीवन में जो जुड़े हैं, उन्हें महत्व दो


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 148वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष बनराय।

अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय॥


भावार्थ:

यह दोहा जीवन और मृत्यु, आत्मा और परमात्मा, और संबंधों की नश्वरता का गहरा बिंब प्रस्तुत करता है।

पत्ता, वृक्ष से कहता है — “हे वृक्षराज, यदि इस बार तुमसे बिछड़ गया, तो फिर शायद कभी तुम्हारा साथ न मिल पाए। मैं दूर जा गिरूंगा, और लौट न सकूंगा।”

यह सिर्फ पत्ता और वृक्ष की बात नहीं — यह आत्मा और शरीर, प्रेम और ईश्वर, और मनुष्य और संबंधों के बीच के अनित्य (क्षणभंगुर) संबंध की ओर इशारा करता है।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण:

वृक्ष यहां परमात्मा का प्रतीक है और पत्ता जीव (आत्मा) का।

जब तक पत्ता वृक्ष से जुड़ा है, वह हरा-भरा है, ऊर्जा से भरपूर है। लेकिन एक बार बिछड़ गया तो वह सूख जाता है, भटकता है, और अंततः मिट्टी में मिल जाता है।

ठीक इसी तरह, जब तक जीव ईश्वर से, श्रद्धा से, भक्ति से जुड़ा रहता है — तब तक उसका जीवन सार्थक है। लेकिन जैसे ही अहंकार, माया, और मोह के कारण वह ईश्वर से विमुख होता है, वह संसार के थपेड़ों में बह जाता है। फिर उस मूल तक लौट पाना कठिन हो जाता है।

सामाजिक और भावनात्मक सन्दर्भ:

यह दोहा मानव संबंधों की नाजुकता को भी दर्शाता है।

रिश्ते — चाहे वो माता-पिता के हों, मित्रता के हों, गुरु-शिष्य के हों या पति-पत्नी के — एक बार टूट गए तो उनका पुनः जुड़ पाना आसान नहीं होता।

पत्ता जैसे कह रहा हो —

“जब तक हम एक साथ हैं, एक-दूसरे को समझो, आदर दो, प्रेम दो।

क्योंकि बिछड़ने के बाद सिर्फ पश्चाताप शेष रह जाता है, साथ नहीं।”

आज के समय में प्रासंगिकता:

आज के समाज में जब रिश्ते क्षणिक, प्रेम स्वार्थी, और धर्म आडंबर बनते जा रहे हैं,

कबीर का यह दोहा एक चेतावनी भी है —

“जीवन में जो जुड़े हैं, उन्हें महत्व दो।

जिनसे प्रेम है, उन्हें जताओ।

जिनका साथ मिला है, उसे संजो लो।

क्योंकि हो सकता है, अगली बार ऐसा अवसर कभी न मिले।”

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