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तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ का गर्भ कल्याणक है 7 मार्च को: तिथि के अनुसार गर्भ कल्याणक फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को मनाया जाता है


जैन धर्म के तीसरें तीर्थंकर भगवान संभवनाथ का गर्भ कल्याणक फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को मनाया जाता है। इस दिन दिगंबर जैन मंदिरों में विभिन्न अनुष्ठान और विधान किए जाते हैं। भगवान का अभिषेक और शांतिधारा के साथ ही अष्ट द्रव्य समर्पित किए जाते हैं। इस बार भगवान का गर्भ कल्याण 7 मार्च शुक्रवार को है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रंखला में आज उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संयोजित प्रस्तुति पढ़िए…


इंदौर। जैन धर्म के तीसरे तीर्थंकर भगवान संभवनाथ का 7 मार्च को गर्भ कल्याणक है। देश के कोने-कोने में दिगंबर जैन मंदिरों में इस दिन विशेष विधान आदि होंगे। भगवान संभवनाथ जी के गर्भ कल्याण सहित अन्य जानकारी से रूबरू होते हैं। दिव्य जीवन रूप से संभवनाथ भगवान का गर्भाधान हुआ और फिर उनका जन्म भरत क्षेत्र में स्थित श्रावस्ती नगरी में राजा जितारी और रानी सेना देवी के घर हुआ था। जब भगवान संभवनाथ रानी सेना देवी के गर्भ में थे। उस वर्ष राज्य में सांभा अर्थात मूंगफली की फसल खूब हुई थी। इसलिए इनका नाम संभवनाथ पड़ा। पुराणों के अनुसार भगवान संभवनाथ जी का जन्म इक्ष्वाकु वंश में हुआ था। उनका चिन्ह अश्व (घोड़ा) था।

उन्होंने सम्मेत शिखर पर अपने सभी कर्मों का क्षय कर निर्वाण प्राप्त किया था। उन्होंने अपने पुत्र को राज्य सौंपकर जनता की गरीबी दूर करने का काम किया था। उन्होंने मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के दिन श्रमण दीक्षा स्वीकार की थी। 14 वर्ष की साधना के बाद कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया था। उनके पहले शिष्य का नाम चारूदत और पहली शिष्या का नाम श्यामा था। उनके पहले गणधर चारूजी थे। तीर्थंकर श्री संभवनाथ भगवान का अंतिम जन्म घातकी खंड द्वीप के ऐरावत क्षेत्र में स्थित क्षेमपुरी शहर में राजा विपुलवाहन के रूप में हुआ था। राजा विपुलवाहन बहुत ही ईमानदार और प्रजा से प्रेम करने वाले व्यक्ति थे।

उन्होंने इस तरह से शासन किया कि उनके राज्य में रहने वाले लोगों को ज़रा भी तकलीफ़ न पहुंचे। वे राजनीति में बहुत निपुण थे। राजा विपुलवाहन धर्म में गहरी रुचि रखते थे। वे अपना अतिरिक्त समय ध्यान, धार्मिक अध्ययन और तीर्थंकरों की पूजा में बिताते थे। वे श्रावक धर्म के 12 व्रतों का पालन करते थे। उनके राज्य से कोई भी व्यक्ति भूखा या खाली हाथ नहीं लौटता था।

संभवनाथ भगवान: बचपन, दीक्षा और केवल ज्ञान

जन्म से ही भगवान संभवनाथ के पास तीन प्रकार का ज्ञान था, श्रुत, मति और अवधि। राजकुमार संभवनाथ राजसी सुख-सुविधाओं के बीच पले-बढ़े, लेकिन उन्हें विलासितापूर्ण जीवनशैली में कोई रुचि नहीं थी। कर्मफल और माता-पिता की आज्ञा के अनुसार, राजकुमार संभवनाथ का विवाह हुआ और उचित आयु में उनका राज्याभिषेक हुआ। बहुत लंबे और शांतिपूर्ण शासन के बाद, देवताओं के अनुरोध पर भगवान संभवनाथ ने दीक्षा ली। दीक्षा लेने के बाद, भगवान ने एक साल तक खूब दान किया (वर्षिदान) और उसके बाद उनका दीक्षा समारोह मनाया गया। तीर्थंकर भगवान के दीक्षा समारोह की पूरी व्यवस्था देवताओं ने की थी। राजा संभवनाथ के साथ 20 हजार अन्य राजाओं ने भी दीक्षा ली थी। 14 वर्ष की दीक्षा के पश्चात राजा संभवनाथ ने अपने संज्वलन कर्म समाप्त किए और कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को सर्वज्ञता, केवलज्ञान प्राप्त किया। केवल ज्ञान प्राप्त करने के बाद ही तीर्थंकर देशना देते हैं, तब तक वे मौन रहते हैं। तीर्थंकर भगवान के ज्ञान प्राप्त करने के बाद देवगण समोवसरन, दिव्य सभा की रचना करते हैं।

तीर्थंकर भगवान के ज्ञान प्राप्त करने के बाद गणधर (तीर्थंकर के प्रमुख शिष्य) स्थापित हो जाते हैं और वे सभी भगवान के समशरण में विराजमान हो जाते हैं। भगवान संभवनाथ के मुख्य गणधर चारु थे। उन्होंने संभवनाथ भगवान से पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया और फिर लोगों को उपदेश दिए; वे लोगों के जीवन में मोक्ष के बीज बो रहे थे। भगवान के दर्शन मात्र से ही कई लोग सर्वज्ञ हो गए और सभी कष्टों से मुक्त हो गए।

देशनाः अनित्य भावना

तीर्थंकर भगवान की वाणी का प्रभाव ऐसा होता है कि वह सभी आवरणों को भेदकर सामने वाले को सर्वज्ञता की प्राप्ति करा देती है। उनकी वाणी अज्ञान के सभी आवरणों से सर्वथा मुक्त होती है। भगवान के तीर्थंकर-नाम-गोत्र कर्म का बंधन इसलिए किया गया है कि लोग मोक्ष प्राप्त करें क्योंकि, तीर्थंकर स्वयं के साथ-साथ अनेकों को भी मोक्ष प्राप्त कराते हैं। इसलिए देवगण भी इस उद्देश्य से समवशरण की रचना करते हैं कि कैसे अधिक से अधिक लोग तीर्थंकर भगवान की वाणी का लाभ उठा सकें। देवगण प्रत्येक घर में संदेश भेजकर तीर्थंकर भगवान की देशना और समोवसरन में आने का निमंत्रण देते हैं। भगवान संभवनाथ ने अपनी देशना में अनित्य भावना के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला है। देशना में भगवान ने बताया कि इस संसार में कौन सी चीजें नित्य हैं और कौन सी चीजें अनित्य हैं। अनित्य का अर्थ है अस्थायी और नित्य का अर्थ है स्थायी। शास्त्रों का अध्ययन करते समय या सत्संग में, केवल कुछ क्षणों के लिए हमें ऐसा लगता है कि यह पूरी दुनिया अस्थायी है और केवल आत्मा ही स्थायी है। इसका कोई अर्थ नहीं है। इस बात को स्थायी रूप से समझने के लिए, यह समझना ज़रूरी है कि कौन सी चीज़ स्थायी है और कौन सी चीज़ अस्थायी है। हम इस दुनिया में अपनी पांच इंद्रियों से जो कुछ भी अनुभव कर रहे हैं। हमें यह जांचने की ज़रूरत है कि वह अस्थायी है या स्थायी।

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