दिल्ली का जैन लाल मंदिर न सिर्फ एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, बल्कि यह आस्था, साहस और चमत्कार का जीवंत प्रतीक भी है। मुगल शासन के अत्यंत कठिन दौर में, जब मंदिरों का अस्तित्व मिटाया जा रहा था, एक जैन सैनिक की भक्ति ने इस मंदिर को जन्म दिया। उसकी श्रद्धा से प्रेरित होकर बना यह छोटा पूजास्थल, औरंगजेब जैसे कट्टर सम्राट के आदेश के बावजूद, एक चमत्कारी घटना के चलते सुरक्षित रहा। कालांतर में यही मंदिर “लश्करी मंदिर” से “लाल मंदिर” के रूप में जाना जाने लगा और आज भी यह देश की धार्मिक विरासत का गौरवशाली प्रतीक बना हुआ है। पढ़िए पुष्पा पांडिया संकलित लेख, जिसे प्रस्तुत कर रही हैं श्रीफल जैन न्यूज की एंकर नीता राजेश जैन…
नई दिल्ली। भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास में कई ऐसी घटनाएं दर्ज हैं जो न केवल आस्था की मिसाल हैं, बल्कि समय की कसौटी पर खरे उतरते हुए आज भी प्रेरणा देती हैं। दिल्ली स्थित जैन लाल मंदिर न सिर्फ राजधानी का सबसे प्राचीन जैन मंदिर है, बल्कि यह एक ऐसे चमत्कारी प्रसंग से जुड़ा है जिसने इतिहास के पन्नों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। यह मंदिर निष्ठा, साहस और ईश्वर भक्ति का प्रतीक है, जिसने मुगल साम्राज्य जैसे शक्तिशाली शासन में भी अपना अस्तित्व न केवल बनाए रखा, बल्कि चमत्कारिक घटनाओं के कारण अपराजेय बन गया। इस लेख में हम उस ऐतिहासिक घटना की चर्चा करेंगे, जिसने एक साधारण सैनिक के घर में शुरू हुए पूजन स्थल को “लश्करी मंदिर” से होते हुए “लाल मंदिर” तक की प्रसिद्धि दिलाई।
आप भी जानिए यह घटना
यह घटना मुग़ल शासनकाल, सन 1656 की है, जब भारत में शाहजहां का शासन था। उस समय किसी भी मंदिर का निर्माण तो दूर, किसी जैन प्रतिमा या मुनि के दर्शन करना भी अत्यंत दुर्लभ था।
शाहजहां उस समय लाल किले में रहकर शासन करता था, और उसके सैनिकों की छावनी खूनी दरवाजे तक फैले खुले मैदान में थी।
एक दिन, सेना के एक जैन सैनिक रामचंद्र को कहीं से भगवान पार्श्वनाथ की एक दुर्लभ प्रतिमा प्राप्त हुई। उसने श्रद्धा भाव से उस प्रतिमा को अपने घर में विराजमान किया और नियमित पूजा-अर्चना शुरू कर दी। सेना के अन्य जैन सैनिक भी वहां दर्शन हेतु आने लगे। धीरे-धीरे यह बात आसपास के जैन श्रावकों तक पहुंची और वे भी पूजा में सम्मिलित होने लगे। थोड़े ही समय में वह स्थान “लश्करी मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
शाहजहां एक क्रूर राजा था, जिसने कई मंदिर ध्वस्त करवाए थे। यह कहना गलत नहीं होगा कि उसे इस मंदिर की जानकारी थी, फिर भी उसने इसे अनदेखा कर दिया।
सन 1658 में शाहजहां को बंदी बनाकर उसका पुत्र औरंगजेब सम्राट बन गया। औरंगज़ेब अत्यंत निर्दयी था। उसने अनेकों जैन मंदिर तुड़वाए, प्रतिमाओं को मस्जिदों की सीढ़ियों पर फिंकवाया और असंख्य हिंदुओं को जबरन मुसलमान बनाया।
ऐसे जैन-विरोधी सम्राट के लिए लाल किले के लाहौर दरवाजे से स्पष्ट दिखने वाला यह मंदिर असहनीय होना चाहिए था। परंतु यह आश्चर्यजनक था कि उसे इस मंदिर की खबर ही नहीं लगी।
लश्करी मंदिर में प्रतिदिन संध्या वेला में अर्चना के समय कुछ देर के लिए नगाड़ा बजाया जाता था। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही थी। अब तक इसकी आवाज़ औरंगज़ेब के कानों तक नहीं पहुँची थी। लेकिन एक दिन उसे यह शोर सुनाई दिया।
औरंगज़ेब ने पास बैठे वज़ीर से पूछा – “यह शोर कैसा है?”
वज़ीर जानता था कि यह नगाड़ा एक जैन सैनिक के घर में बने मंदिर में बजता है, वह स्वयं भी आश्चर्यचकित था कि आज तक यह आवाज़ क्यों नहीं आई। उसने उत्तर दिया –
“शहंशाह, यह नगाड़ा आपके ही एक वफादार सैनिक के घर में बने मंदिर में संध्या समय थोड़ी देर के लिए बजता है।”
औरंगज़ेब का क्रोध शांत हुआ और उसने आदेश दिया –
“कल से यह शोर हमें सुनाई न दे।”
यह आदेश सुनकर सभी जैन श्रावक भयभीत हो गए। अगले दिन किसी में भी नगाड़ा बजाने का साहस नहीं हुआ, क्योंकि कोई भी औरंगज़ेब के ग़ुस्से का शिकार नहीं बनना चाहता था।
तभी एक चमत्कार हुआ – वह नगाड़ा स्वयं बजने लगा। उसकी गूंज से लाल किले की दीवारें थर्रा उठीं।
औरंगज़ेब अपने आदेश की अवहेलना देखकर क्रोधित हो उठा। वह कुछ कहने ही वाला था कि वज़ीर दौड़ता हुआ आया और बोला –
“शहंशाह, करिश्मा हो गया! लश्करी मंदिर का नगाड़ा स्वयं बज उठा। यह चमत्कार मैंने अपनी आँखों से देखा है।”
कुछ समय के लिए औरंगज़ेब स्तब्ध रह गया। वह जानता था कि उसका वज़ीर कभी झूठ नहीं बोलता। फिर भी उसने डाँटते हुए कहा –
“क्या बकते हो? ऐसा कैसे हो सकता है?”
वज़ीर ने कहा –
“यदि विश्वास न हो, तो कल स्वयं चलकर देख लीजिए।”
औरंगज़ेब ने यह बात मान ली। अगले दिन वह पूजा के नियत समय से पहले ही मंदिर पहुँचा। उसने मंदिर खाली करवाकर ताला लगवा दिया।
और जैसा पूर्व दिन हुआ था, वैसा ही इस दिन भी हुआ – तय समय पर नगाड़े स्वयं बजने लगे। औरंगज़ेब चकित रह गया। उसने तुरंत ताला खुलवाया और स्वयं अपनी आँखों से वे नगाड़े बजते देखे। यह देख वह दंग रह गया।
उसने उसी क्षण शाही फरमान जारी किया –
“इस बुतख़ाने में नगाड़ा पूर्ववत बजता रहे, फ़ैज़ाने इलाही पर बंदिश नहीं लगाई जा सकती।”
शाहजहानाबाद के इस प्राचीनतम जैन जिनालय की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। इसका स्वरूप विकसित होता गया। यह दिल्ली का पहला मंदिर था जो एक सैनिक के घर में बना था, इसलिए इसे लश्करी मंदिर कहा गया। बाद में यह उर्दू मंदिर भी कहलाया क्योंकि इसके पास उर्दू बाजार लगता था।
सन 1878 में इसके पुनर्निर्माण में लाल पत्थरों का उपयोग हुआ, तब से यह लाल मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। आज तक, अर्थात् 141 वर्षों से, यही नाम प्रचलन में है।
हमें गर्व होना चाहिए कि हमने जैन कुल में जन्म लिया। यह जिन शासन का प्रभाव ही था कि जिसके सामने मुग़ल सम्राट को भी नतमस्तक होना पड़ा।
यह कोई काल्पनिक कथा नहीं, अपितु पूर्णतः सत्य ऐतिहासिक घटना है, जिसकी चर्चा अंग्रेज़ इतिहासकारों ने भी अपनी पुस्तकों में की है।













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