दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -72 सत्य की खोज के लिए वासना को छोड़ें : मन को सांसारिक इच्छाओं से मुक्त करें


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 72वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


जहां काम तहां नाम नहीं, जहां नाम नहीं वहां काम।

दोनों कबहूं नहीं मिले, रवि रजनी एक धाम।।


इस दोहे का गहन अर्थ यह है कि जिस मन में “काम” (वासना, इच्छाएं, भौतिकता) का प्रभाव है, वहां “नाम” (ईश्वर-चिंतन, भक्ति, आत्मज्ञान) नहीं ठहर सकता। और जहां “नाम” का प्रकाश फैल जाता है, वहां “काम” की तामसिकता स्वयं ही समाप्त हो जाती है।

यह वैसा ही है जैसे सूर्य के उदय होते ही अंधकार समाप्त हो जाता है, और अंधकार होते ही सूर्य अदृश्य हो जाता है। दोनों एक साथ एक स्थान पर नहीं रह सकते।

आत्मा मूलतः शुद्ध है, लेकिन जब वह माया (इच्छाओं) के जाल में फंसती है, तो उसका “नाम” से संबंध टूट जाता है।

माया से प्रभावित मन भगवान को भूलकर सांसारिक विषयों में लिप्त हो जाता है, और जैसे ही मन सांसारिक इच्छाओं से मुक्त होता है, वह पुनः ईश्वर की ओर मुड़ जाता है।

इसलिए, संसार और ईश्वर दोनों का साथ एक साथ नहीं हो सकता।

यहां कबीर हमें ब्रह्मज्ञान की ओर ले जा रहे हैं और संकेत कर रहे हैं कि जो व्यक्ति सच्चे आध्यात्मिक मार्ग पर बढ़ना चाहता है, उसे अपनी वासनाओं, इच्छाओं और सांसारिक आसक्तियों का त्याग करना होगा।

“काम” क्षणिक है—जो आज है, वह कल समाप्त हो जाएगा।

“नाम” शाश्वत है—यह केवल ईश्वर नहीं, बल्कि परम सत्य की ओर हमें ले जाता है।

इसलिए, जिसने “काम” को त्यागकर “नाम” में रमण कर लिया, उसने सत्य को पा लिया, मोक्ष प्राप्त कर लिया।

इसलिए, यदि हम सत्य की खोज में हैं, तो हमें “वासना” को छोड़कर “नाम” का सहारा लेना ही होगा। यही जीवन का परम सत्य है।

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