आज का युग ‘रिएक्शन’ का युग है, छोटी सी बात पर रिश्ते टूट जाते हैं, पोस्ट पर कमेंट्स से भावनाएं आहत हो जाती हैं। अहंकार इतनी ऊंचाई पर बैठा है कि ‘मैं गलत नहीं हो सकता’ का भ्रम हमें अंदर से खोखला कर देता है यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। भोपाल से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…
भोपाल (अवधपुरी)। आज का युग ‘रिएक्शन’ का युग है, छोटी सी बात पर रिश्ते टूट जाते हैं, पोस्ट पर कमेंट्स से भावनाएं आहत हो जाती हैं। अहंकार इतनी ऊंचाई पर बैठा है कि ‘मैं गलत नहीं हो सकता’ का भ्रम हमें अंदर से खोखला कर देता है यह उद्गार मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज ने व्यक्त किए। क्षमावाणी पर्व आंतरिक सफाई का पर्व है जैसे दीपावली पर हम घर की सफाई करते हैं, वैसे ही क्षमावाणी पर्व आत्मा की सफाई का पर्व है। मुनि श्री ने कहा कि क्षमा मांगने को लोग कमजोरी मानते हैं,पर सच्चाई यह है कि क्षमा करने के लिए सबसे अधिक साहस चाहिए। “क्षमा वीरस्य भूषणम।” या“मिच्छामी दुक्कड़म” सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि यह हमारा संकल्प बने “मिच्छामी दुक्कड़म”का अर्थ है “ ’यदि मुझसे जाने-अनजाने कोई अपराध, कोई कटुता, कोई चुभन हुई हो, तो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूँ।”’ मुनि श्री ने कहा कि बाहर से हम कितने ही पूजा पाठ, व्रत उपवास कर लें,यदि हमारे अंदर काम, क्रोध, लोभ,और मोह की दुवृत्तियां पनप रही है तो हमारा क्षमावाणी मनाना सार्थक नहीं हो सकता।
विकृतियों को ‘भावनायोग’ के अभ्यास से हटाया जा सकता है
उन्होंने कहा कि क्षमा करने और क्षमा मांगने में मन वाणी और व्यवहार में पवित्रता होंना जरुरी है। तन की अपवित्रता तो बाहर के जल से साफ हो सकती है, लेकिन मन की पवित्रता के लिए विद्वेष, वासना, लोभ, ईष्या, वैमनस्यता,छल, कपट से रिक्त होना जरूरी है। इन विकृतियों को ‘भावनायोग’ के अभ्यास से हटाया जा सकता है। मुनि श्री ने कहा ’भावनायोग करने से जैसा हम चाहेंगे वैसा हमारा जीवन बनेगा। मनोविज्ञान भी कहता है कि जैसा हम देखते है, जैसा हम सुनते है तथा जैसा हम महसूस करते हैं। वह सभी घटनाएं और संस्कार हमारे अवचेतन मन में अंकित हो जाते है और यहीं से हमारा अवचेतन मन हमारे चेतन मन को प्रभावित करता है, इसलिए मन को अपवित्र करने वाले संसर्ग से बचिए।
क्षमावाणी पर्व आत्म शुद्धि का पर्व है
मुनि श्री ने कहा धर्म पवित्र हृदय में ही बसता है, और मन की मलिनता धर्म की तेजस्विता को मंद कर देती है। जिसका मन अपवित्र होता है, वह लोभ और लालसा से भरा एवं सदैव असंतुष्ट रहता है, जो खुद बुरा सोचता है। वह दूसरों को भी बैसा ही मानता है और वह कभी किसी को सम्मान नहीं दे सकता, क्षमावाणी पर्व आत्म शुद्धि का पर्व है आत्मशुद्धि लिए बोध वाक्यों को बार-बार दोहराइए। मैं शुद्ध आत्मा हूं। मैं पवित्र आत्मा हुं पवित्रता मेरा स्वभाव है। पवित्रता मेरा धर्म है, जब हम बार -बार इन वाक्यों को दोहराएंगे तो यह हमारे भावों को शुद्ध करने में निमित्त बनेगा। मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया आगामी 14 सितंबर रविवार को संपूर्ण भोपाल के जैन समाज का मुनिसंघ के सानिध्य में क्षमावाणी पर्व दोपहर1.30 बजे से आयोजित है। चातुर्मास चक्रवर्ती तथा सभी नवरत्न एवं विद्याप्रमाण गुरुकुलम तथा गुणायतन की पूरी टीम आपका स्वागत करने के लिए आतुर हैं।













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