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धर्म सभा में दिए प्रवचन : क्षमा पुस्तकों का धर्म नहीं आत्मा का धर्म है-उपाध्यायश्री विहसन्तसागर जी महाराज


श्री महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर डी ब्लाक कमलानगर में बुधवार को उपाध्याय विहसन्तसागर जी मुनिराज एवं मुनि श्री विश्वसाम्य सागर जी महाराज ससंघ के मंगल सानिध्य में क्षमावाणी पर्व के अन्तर्गत क्षमामिलन के अद्भुत दृश्य दिखे, जहां पूज्य उपाध्याय श्री विहसन्त सागर जी महाराज के चरणों मे झुक पूज्य मुनिवर विश्व साम्य सागर जी ने बारम्बार क्षमा मांगी तो वहीं सभी श्रावकगण भी तीन बार एक दूसरे से उत्तम क्षमा बोल गले मिलकर क्षमा मांगी। पढ़िए यह रिपोर्ट…


आगरा। श्री महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर डी ब्लाक कमलानगर में बुधवार को उपाध्याय विहसन्तसागर जी मुनिराज एवं मुनि श्री विश्वसाम्य सागर जी महाराज ससंघ के मंगल सानिध्य में क्षमावाणी पर्व के अन्तर्गत क्षमामिलन के अद्भुत दृश्य दिखे, जहां पूज्य उपाध्याय श्री विहसन्त सागर जी महाराज के चरणों मे झुक पूज्य मुनिवर विश्व साम्य सागर जी ने बारम्बार क्षमा मांगी तो वहीं सभी श्रावकगण भी तीन बार एक दूसरे से उत्तम क्षमा बोल गले मिलकर क्षमा मांगी।

क्षमा का महत्व बताते हुए उपाध्याय श्री ने कहा कि एक करोड़ पूजाओं से भी अधिक पुण्य एक भक्तामर स्त्रोत के पाठ से है तो एक करोड़ भक्तामर स्त्रोत के पाठ से भी अधिक पुण्य एक नवकार की जाप से है,तो एक करोड़ नवकार जाप से भी अधिक पुण्य एक ध्यान में है व एक करोड़ बार ध्यान करने से भी अधिक पुण्य किसी एक को मन से वचन से काय से क्षमा करने में है।

उन्होंने कहा कि क्षमा पुस्तकों का नहीं आत्मा का धर्म है, इस अवसर पर वार्षिक कलशाभिषेक भी सम्पन्न हुए माल की बोली का सौभाग्य अजित जैन को मिला। इस अवसर पर महाराज जी के सानिध्य मे दसलक्षण व्रत करने आये बाहर के युवाओं और उनके परिवारों का व स्थानीयों व्रतीयों सम्मान एवं स्वागत किया गया! इससे पूर्व सभी उपवास कर्ताओं का पाणना भी कराया गया।

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