मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने चार शब्द अर्थ, व्यर्थ, अनर्थ और परमार्थ की व्याख्या करते हुए कहा कि जीवन को व्यर्थ और अनर्थ से बचाना है तो अपने समय, शक्ति और संसाधनों का सही उपयोग करो। इनको सही दिशा दो। भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन विद्यावाणी की खबर…
भोपाल (अवधपुरी)। अपने जीवन में यदि आपने पुण्य नहीं किया। यह जीवन व्यर्थ गया लेकिन, यदि उसे पाप के कार्य में रमा दिया या किसी का शोषण किया तो आपका जीवन को अनर्थ किया। वहीं आपने सही नियोजन कर अपने अर्थ को परमार्थ में लगा दिया तो वह आपका सही प्रयोजन है। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज ने चार शब्द अर्थ, व्यर्थ, अनर्थ और परमार्थ की व्याख्या करते हुए व्यक्त किए। मुनि श्री ने कहा कि जीवन को व्यर्थ और अनर्थ से बचाना है तो अपने समय, शक्ति और संसाधनों का सही उपयोग करो। इनको सही दिशा दो, गलत कार्यों में इनका नियोजन तो कभी करना ही नहीं चाहिए। यह अपनी आत्मा के साथ छल और अनर्थ है।
उन्होंने कहा कि आपने विचार किया कभी में अनर्थ की ओर बढ़ रहा हूं या मेरे जीवन में अनर्थ घट रहा है? उन्होंने दूध का उदाहरण देते हुए कहा कि दूध के दोहने का कोई अर्थ है। वहीं दूध का फट जाना व्यर्थ है। वहीं दूध को ढोल देना अनर्थ है। वहीं दूध को जमाकर उसका घी निकाल लैना परमार्थ है। जीवन दूध की तरह है। इसका सही उपयोग करो व्यर्थ मत जाने दो।
जीवन को सही दिशा नहीं दोगे तो विकृति आएगी
मुनिश्री ने कहा कि जीवन को सही दिशा नहीं दोगे तो जीवन में विकृति आएगी और जीवन बरबाद होगा। संत कहते है जीवन को जिओ और जीवन को बर्बाद होने से बचाओ। जिससे बाद में पछताना न पड़े। उन्होंने अल्फ्रेड नोबल जो कि डायनामाइट का आविष्कारक था का उदाहरण देते हुए कहा कि उसके मन में विचार आया कि लोग मेरे मरने के बाद किस रूप में याद करेंगे? उसने समाचार पत्र में एक झूठी विज्ञप्ति दे दी कि अल्फ्रेड नोबल मर गया। अखबारों ने इस खबर को फ्रंट में छापा। मौत का सौदागर सदा के लिए सो गया। अल्फ्रेड नोबल ने जब यह पढ़ा तो उसने अपने आपको धिक्कारते हुए कहा कि इस दुनिया से जाने के बाद लोग मुझे मौत के सौदागर के रूप में याद करेंगे और उसने निर्णय लिया कि मुझे मौत का सौदागर नहीं शांति का दूत बनना है और इसी भावना से उसने अपनी संपत्ति को शांति के लिए जो नोबल पुरस्कार के रूप में लगा दिया, जो आज भी नोबल पुरस्कार के रूप में दिया जाता है।
आंखें बंद कीजिए और एक प्रयोग कीजिए
मुनि श्री ने कहा कि थोड़े से चिंतन ने अल्फ्रेड नोबल की दिशा बदल दी। आप सभी लोग आंखें बंद कीजिए और एक प्रयोग कीजिए। आप मर गए हैं। चारों ओर से लोग एकत्रित हैं। आपकी अर्थी को बांध कर शमशान ले जाया गया। वहां पर उस कफन को निकालकर अग्नि के हवाले कर दिया गया। उसी समय कुछ लोग अपने-अपने मोबाइल में लग गए तो कुछ लोग अपनी अपनी गपशप कर रहे थे तो तो कुछ लोग कपाल क्रिया होने का इंतजार कर रहे थे कि कब हो और मैं राख में परिवर्तित हो गया। शोक सभा हुई और मेरे विरोधियों ने भी मेरा गुणगान किया। कुछ दिनों घर में बैठकों का सिलसिला चला मैंने देखा कि कल तक जो कहा करते थे कि तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे? वह सभी अपने-अपने काम में लग गए। यह कहानी मेरी नहीं सभी की है।
सभी को तो राख होना है
जिन्होंने अपने जीवन में कुछ अच्छे कार्य किये उनको भी लोग कुछ समय तक ही याद करते है फिर भूल जाते हैं। मुनि श्री ने कहा कि एक दिन तो सभी को तो राख होना है।’मेरा भी राख होगा तेरा भी खाक होगा। यही जीवन की सच्चाई है। इसी मोहमाया में ही पूरा जीवन व्यर्थ हो जाता है, फिर याद आता है। यदि मैंने अपनी आत्मा को पहचान कर कल्याण का मार्ग अपनाया होता तथा मोक्ष मार्ग के अनुरूप चला होता तो मैं भी परमार्थ के रास्ते पर चल अपनी इस आत्मा को भवभव के बंधन से मुक्त कर लेता।
रविवार को होगा क्षमावाणी पर्व
रविवार को दोपहर 1.30 बजे से वृहद क्षमावाणी पर्व मुनिसंघ के सान्निध्य में मनाया जाएगा। इसमें भोपाल तथा आसपास के जिले से भी श्रद्धालु सम्मलित होंगे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराजसिंह चौहान तथा सांसद आलोक शर्मा सहित जनप्रतिनिधि शामिल होंगे।













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