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स्मृति नगर स्थित श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर में बारह भावना पर प्रवचन : संसार की हर वस्तु, द्रव्य क्षणिक है – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज


अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने बारह भावना प्रवचन श्रृंखला में दूसरे दिन धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि पुण्य -पाप, सुख- दुख, रात- दिन, जवानी- बुढ़ापा नित्य नहीं हैं, ये सब बदलते रहते हैं। यहां तक कि ऋतु भी बदलती रहती है। संसार की हर वस्तु, द्रव्य क्षणिक है, कोई भी शाश्वत नहीं है। हो सकता है कि जो अभी है, वह अगले क्षण भी न हो। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


इंदौर। श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में बारह भावना प्रवचन श्रृंखला के दूसरे दिन अनित्य भावना का अर्थ बताते हुए आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि पुण्य -पाप, सुख- दुख, रात- दिन, जवानी- बुढ़ापा नित्य नहीं हैं, ये सब बदलते रहते हैं। यहां तक कि ऋतु भी बदलती रहती है। संसार की हर वस्तु, द्रव्य क्षणिक है, कोई भी शाश्वत नहीं है। हो सकता है कि जो अभी है, वह अगले क्षण भी नहीं हो। तीर्थंकर भगवान का लगने वाला समवशरण और उस समय देवों के द्वारा किए जाने वाले अतिशय भी शाश्वत नहीं हैं तो फिर आप ही समझ लो कि आप सांसारिक जीवों के उपयोग में आने वाली वस्तुएं, द्रव्य कैसे शाश्वत हो सकते हैं। शरीर, धन- वैभव, मान- सम्मान, नित्य नहीं। इन्हीं के कारण हम अशुभ कर्म का बंध करते हैं। तुम संसार में खुश रहना चाहते हो तो सभी वस्तुओं को अनित्य मान लो। इसके बाद खुशी की ढूंढने की जरूरत नहीं होगी। तुम्हें अपने आप अपने अंदर ही दिखेगी। अनित्य भावना का अगर हम चिंतन करते हैं तो हम अहंकार से दूर हो जाते हैं।

कुछ भी शाश्वत नहीं है

मुनि श्री ने बताया कि जैसे रावण ने अपनी स्वर्ण नगरी, स्वर्ण महल, शक्ति, बुद्धि, ज्ञान को नित्य माना और इसी अहंकार में उसने भगवान राम से युद्ध भी किया तो क्या हुआ। उसकी स्वर्ण नगरी, ज्ञान, बुद्धि, शक्ति सभी नष्ट हो गए और वह मरण को प्राप्त हो गया। यहां तक कि उसका भाई भी उसे छोड़ कर के चला गया था। अगर वास्तव में हमें सुखी रहना है तो हमारे पास जो सुख या दुख है, उसके बारे में मान लेना चाहिए कि यह शाश्वत नहीं है, इसका विनाश होने वाला है। जैसे ओस की बूंद धूप में नष्ट हो जाती है, हाथ की अंजुली में पानी अधिक देर तक नहीं ठहरता। उसी प्रकार संसार के सभी द्रव्य अनित्य हैं, यही मान के हम संसार में रहेंगे और द्रव्य, वस्तु का उपयोग करेेंगे तो हमें दुख नहीं होगा। धर्म सभा में क्षुल्लक अनुश्रमण सागर महाराज भी उपस्थित थे। सभा का संचालन ब्रह्मचारी अजय भैया ने किया।

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