वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि अपने अंदर खोजना है कि कैसे हमारी आत्मा बुरे परिणामों को कर हमें दुखी बना देती है। ज्ञान तो हमारे अंतःकरण का हिस्सा है जो हमें संस्कारों से ही मिलते है। मंदबुद्धि सरल परिणाम का कल्याण हो सकता लेकिन यदि मंदबुद्धि के साथ अहंकारी है तो उसका कल्याण नहीं है सकता है। पढ़िए एक रिपोर्ट…
रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि अपने अंदर खोजना है कि कैसे हमारी आत्मा बुरे परिणामों को कर हमें दुखी बना देती है। ज्ञान तो हमारे अंतःकरण का हिस्सा है जो हमें संस्कारों से ही मिलते है। मंदबुद्धि सरल परिणाम का कल्याण हो सकता लेकिन यदि मंदबुद्धि के साथ अहंकारी है तो उसका कल्याण नहीं है सकता है।
मुनिराज ने ऐसे प्राप्त किया केवलज्ञान
शिवकोटि महाराज को 12 वर्ष तक णमोकर मंत्र याद नहीं हुआ। गुरु के द्वारा बार-बार बतलाने पर भी याद नहीं होता था अतः गुरुदेव ने उन्हें समझाया कि तुम तो इतना ध्यान रखो कि ‘मा रुष मा तुष’’ अर्थात् राग मत करो, द्वेष मत करो। इतने मात्र से तुम्हारा कल्याण होगा। वे मुनिराज यही वाक्य रटते-रटते एक दिन उसे भी भूल गए, तब उन्हें बड़ा दु:ख हुआ। किन्तु ज्ञानावरण कर्म का तीव्र उदय से वे बेचारे कर भी क्या सकते थे, वे यत्र-तत्र विहार कर रहे थे आखिर एक दिन वह शुभ दिवस भी आया जब वे एक गांव से निकल रहे थे, अकस्मात् उनकी दृष्टि एक महिला पर पड़ी जो अपने घर के बाहर बैठी हुई उड़द की दाल धो-धो कर छिलका अलग कर रही थी। इस दृश्य को देखते ही उनकी अन्तरात्मा जागृत हो गई। अज्ञान का आवरण हटा और स्मृतिपटल पर गुरुदेव के शब्द प्रस्फुटित हो गए। चिन्तन चला कि मेरे गुरु ने शायद यही तो बताया था जो महिला कर रही है अर्थात् उन्होंने रटना शुरू कर दिया ‘‘तुषमाषभिन्नं’’ माष का अर्थ होता है उड़द और तुष का अर्थ छिलका। उन मुनिराज ने समझ लिया कि जैसे उड़द की दाल से छिलका अलग किया जाता है उसी प्रकार से मैंने अपनी चैतन्य आत्मा से शरीर को पृथक् करने के लिए जैनेश्वरी दीक्षा धारण की है। अनन्तर वही क्रिया उनके आत्मकल्याण में प्रेरणास्रोत बनी और इसी का चिन्तन करते-करते एक दिन वे शुक्लध्यान में आरूढ़ हो गए और उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति भी हो गई। और तुस्मास भिन्न का ध्यान करके कि दाल अलग है छिलका अलग है, इसी प्रकार मेरी आत्मा अलग है और शरीर अलग है इसका ध्यान करके केवलज्ञान प्राप्त कर लिया।
जितना दूसरों को दुख दोगे तो तुम्हे भी दुख भोगना पड़ेगा
अज्ञानी होना ठीक है लेकिन ज्ञानी होकर गलत काम करना , असत्य बोलना ठीक नहीं है । आलस्यो मंद बुद्धि व्यक्ति अपनी बात को सिद्ध करने के लिये झूठ को सही और सही को गलत बता देता है। वर्तमान परिस्थितियों में हमे बाहरी शिक्षा तो मिल जाती है परंतु संस्कारी शिक्षा का अभाव होता है जो माता-पिता, दादा दादी के पास से जो जीवन के अनुभव प्राप्त होते है हमें वे डिग्रियों से प्राप्त नहीं होते, हमें उनके प्रति विनयवान होना चाहिए। इन्द्रिय विषयों का लोभी जो खाने-पीने के शौकीन है, पांचों इन्द्रियों के विषयों को भोगने में हिंसा का विकल्प भी नहीं करते हैं, चाहे जो करना पड़े। जितना भी छल-कपट करके, हिंसा करके धन का संग्रह कर लो, यह सब तिर्यंच गति में ले जाने के कारण है। जैन दर्शन कहता है जितना कर्ज लिया है वो चुकाना तो पड़ेगा, जितना दूसरों को दुख दोगे तो तुम्हे भी दुख भोगना पड़ेगा। इस जनम में न सही परभव में मिलता है पर अपने-अपने कर्मों का फल सबको मिलता है।













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