मुनिश्री सुधासागर जी महाराज गुना जिले के अशोकनगर में विराजित हैं। वे यहां पर सुभाष गंज में रोजाना धर्मसभा में अपनी तेजस्वी वाणी से धर्मानुरागियों को धर्म प्रभावना से जोड़ रहे हैं। उनके प्रवचनों में बालकों के लालन-पालन के लिए समझदारी का संदेश भी दिया जा रहा है। अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…
अशोकनगर। मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने शुक्रवार को धर्मसभा में संबोधित करते हुए कहा कि बच्चे का काम गलत कार्य करना है और मां का काम उसे सही कार्य कराना है, बच्चा उद्दंड होगा, मां उसे सज्जन बनाएगी, पूरी ताकत लगाएगी। अब ऐसे बालकों को सुधारने के लिए मां को तीन नीतियां अपनानी पड़ती हैं- पहले समता से समझाते हैं, फिर दंड से समझाते हैं और दंड से नहीं मानता है तो भेद से समझाते हैं। मां का एक ही लक्ष्य है, मैं बालक को बिगड़ने नहीं दूंगी। ऐसे ही दो माताएं और है- एक प्रकृति माता है, प्रकृति भी यही चाहती है कि मेरी गोद में पलने वाला हर बालक सुखी हो। जब कोई गार्जियन, जिम्मेदार व्यक्ति बुद्धिहीन होता है तो उसे सलाह दी जाती है कि तुम कोई पीए रख लो, इसलिए सरकार ने भी सलाहकार बनाए क्योंकि, उन्हें मालूम होता है कि नेता में कितनी अकल होती है।
शिष्य वही जो गुरु के मन की बात को भी पढ़ ले
दो प्रकार के आचार्य हमने देखे, एक आचार्य वो है जो स्वयं समर्थ है संघ का संचालन करने में और स्वयं ज्ञानी भी है उन्हें किसी की जरूरत नहीं है, वो दीक्षा दे भी सकते हैं और पढ़ा लिखा भी सकते हैं, उनके संघ में उपाध्याय नहीं होते क्योंकि वे अकेले ही समर्थ होते है जैसे ऐसे आचार्य आज कोई यदि हुए हैं तो उनका नाम है संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज तो सब तरफ से समर्थ थे ज्ञान, बुद्धि और हुकूमत में भी। शिष्य बनना कोई हंसी मजाक नहीं है गुरु से भी ज्यादा कठिन है शिष्य बनना क्योंकि वास्तविक शिष्य वही है जो गुरु के मन की बात को भी पढ़ लेता है। दूसरे नंबर का शिष्य वह है जो आंखों से पकड़ लेता है कि गुरु ने आज मेरी तरफ किस दृष्टि से देखा है, वात्सल्य दृष्टि से देखा है या वक्र दृष्टि से, तदनुसार वह वैसी चर्या कर लेता है। लेकिन कुछ आचार्य ऐसे होते हैं जिनका अच्छा प्रभाव होता है, सारे संघ को अनुशासित कर लेते हैं लेकिन ज्ञान, अध्ययन नहीं है अथवा संघ बड़ा हो तो फिर उपाध्याय परमेष्ठी पद की स्थापना की।
समझदार पुरुष को ही विवाह करना चाहिए
तुम कैसे हो यह महत्वपूर्ण नहीं है तुम्हारा सलाहकार कैसा है? तुम्हारा दोस्त, तुम्हारा पार्टनर कैसा है? माता-पिता मूर्ख हैं कोई बात नहीं, बेटा कैसा है? दो में से कोई एक ज्ञानी होना चाहिए। स्त्रियों को यदि मालूम चले कि हमारी अकल ठीक नहीं है, इसलिए हर स्त्री को पुरुष पति समझदार चाहिए। समझदार पुरुष को ही विवाह करना चाहिए, मूर्ख को नहीं क्योंकि, तुम्हारे ऊपर एक नारी को संभालने की जिम्मेदारी आ रही है। जिसमें इतनी ताकत हो कि वह अपनी स्त्री को बचा सके, सुरक्षित रख सके, उसकी जिंदगी में आई हुई समस्याओं का समाधान कर सकें। घर में एक भाई समझदार है तो चल जाएगा, तुम पूरी समझदार न हो तो रिश्तेदार को सलाहकार बनाना और कोई न मिले तो हर मूर्ख का एक मित्र समझदार होना चाहिए।
एक सेठ के प्रति इतनी आत्मीयता बनाओ वो तुम्हें अपना मान ले
ऐसे एड्रेस खोज कर रखो कि जब दुनिया में कोई काम नहीं आता तब फैलाने सेठ के दरवाजे पहुंच जाओ, वो कोई न कोई सहायता किए बिना नहीं रहेगा। तुम्हें संसार में जीना है तो किसी एक सेठ से बना कर जरूर चलना है, इतना बनाना है कि सिर्फ तुम्हारी आफत सुनकर सेठ भी कहे कि ये तो अपना व्यक्ति है। एक सेठ के प्रति इतनी आत्मीयता बनाओ कि वो तुम्हें अपना मान ले। सर्वाेच्च ज्ञानी को अपना गुरु बनाकर रखना, जहां तुम्हारी बुद्धि न चले। भाई से कितना ही बैर कर लेना लेकिन, भगवान से एक ही प्रार्थना करना जिंदगी भर भाई से नहीं बनी, आगे जाकर न्यारे होते ही है, बस भाई का इतना प्रेम बना रहे, जिस दिन तुम्हारे घर में रोटी न बने तो भाई अपने साथ थाली में बैठकर रोटी खिला सके। आपस में इतने मत लड़ो कि तुम्हारे ऊपर संकट आने पर दुश्मन नहीं, भाई खुशी मना रहा है, इसलिए बैर करते समय यह देख लेना कि कल वो संकट में भी काम आ जाए।
हर बोलने वाले को गूंगे की तैयारी करना है
हर दुःखी आदमी को दुख के दिनों की तैयारी करना है, हर आंखों वाले को अंधेपने की तैयारी करना है। हर कानो वालों को बहरेपन में जीने की तैयारी करना है, हर बोलने वाले को गूंगे की तैयारी करना है। हर अमीर को गरीबी में रहने की तैयारी करना है, जाओ तुम्हे दुनिया का कोई व्यक्ति दुखी नहीं कर पाएगा। हर नारी को यह तैयारी सोच कर चलना है कि साथी किसी भी क्षण किसी भी समय छूट सकता है तो क्या तैयारी है? नीति है रानी को तलवार अस्त्र-शस्त्र चलाना भी आना चाहिए।













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