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जो शाश्वत उसे प्राप्त करना उत्तम सत्य धर्म : आचार्य श्री विमर्शसागर जी ने बताया उत्तम शौच धर्म का महत्व


उत्तम सत्य धर्म-दूसरों को पीड़ादायक कठोर वचन परनिंदापरक वचन, झूठ वचन तथा दूसरों को नीचा दिखाने वाले वचन, असत्य की श्रेणी में आते हैं। सहारनपुर से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…


 सहारनपुर। उत्तम सत्य धर्म-दूसरों को पीड़ादायक कठोर वचन परनिंदापरक वचन, झूठ वचन तथा दूसरों को नीचा दिखाने वाले वचन, असत्य की श्रेणी में आते हैं। इन सभी असत्य वचन को त्याग कर हित-मित प्रिय वचन कहना, उत्तम सत्य धर्म है। इस धर्म के होने पर ही धार्मिकता होती है। उत्तम सत्य धर्म-सत्य व्यक्तिगत अनुभूति का नाम है। सत्य की अनुभूति के पूर्व जीवन में उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव और शौच को प्रगट करना पड़ता है तब सत्य का अनुभव हो पाता है। सत्य की सिर्फ अनुभूति की जा सकती है क्योंकि, सत्य वस्तु का स्वभाव है। सत्य सिर्फ अनुभव का विषय है, इसमें किसी को शामिल नहीं किया जा सकता। कोई पूछे जल का स्वभाव शीतलता कैसा होता है? अरे भाई ! वो तो जैसा होता है वैसा ही होता है, जहाँ सत्य के प्रति प्रश्न खड़ा हो जाये, वहाँ शब्द मौन हो जाते हैं, क्योंकि अनुभव को शब्दों से नहीं बताया जा सकता। सत्य दो प्रकार का होता है, एक निश्चय सत्य और दूसरा व्यवहार सत्य। निश्चय सत्य वह है जो अविनाशी है दूसरा सत्य व्यवहार सत्य है जो लोक व्यवहार में बोला जाता है। निश्चय सत्य बोला नहीं जाता, सिर्फ अनुभव किया जाता है और व्यवहार सत्य वह है जो शब्दों के द्वारा प्रगट होता दिखता है।

जीवन में इस शब्द रूप वाणी का बहुत प्रभाव होता है। एक वाणी वो है जो घाव कर देती है और एक वाणी वो है जो घाव को भर देती है उत्तम सत्य धर्म स्वपर का भेद विज्ञान करने वाले निग्रंथ योगीराज द्वारा पालन किया जाता है। सत्य वचन, उत्तम सत्य धर्म नहीं है, उत्तम सत्य धर्म तक पहुँचने का मार्ग है। उत्तम सत्य तो निज शुद्धात्मा है। सत्य बोलना व्यवहार उत्तम सत्य धर्म है और निज शुद्धात्मा निश्चय उत्तम सत्य धर्म है। सत्य शाश्वत है और जो शाश्वत है वही सत्य है। सत्य त्रैकालिक होता है। सत्य कभी नष्ट नहीं होता, सत्य कभी परिवर्तित नहीं होता। अग्नि में ऊष्णता है यह सत्य है, यह सत्य किसी भी काल में, दिन में, रात में हमेशा हमारे साथ है। सत्य को कभी झुठलाया नहीं जा सकता। हमारी मनुष्य पर्याय शाश्वत नहीं है, कथंचित सत्य है कथंचित असत्य है पर्याय का सत्य यही है कि वह बदलती रहती है और द्रव्य का सत्य यही है कि वह शाश्वत होता है। शाश्वत सत्य और व्यवहारिक सत्य को जानकर उत्तम सत्य धर्म की प्राप्ति का पुरुषार्थ करना चाहिये। जैन धर्म के दशलक्षण महापर्व में आज उत्तम सत्य धर्म का दिन है सहारनपुर मे परम पूज्य भावलिंगी संत दिगंबर जैनाचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज ससंघ (30 पिच्छी) के सानिध्य में ‘उपासक धर्म संस्कार शिविर’ में जैन धर्मानुयायी भावशुद्धि द्वारा अपने जीवन को सफल कर रहे हैं।

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