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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : परिवारों में धर्म, संस्कार और संस्कृति का वातावरण बनाने पर जोर


हुमड़ भवन में विराजित आचार्यश्री वर्धमान सागरजी महाराज और सुशिष्या महायशमति माताजी ने चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन हुए। इसमें दोनों ने परिवार में संस्कार विकसित करने पर जोर दिया। पढ़िए राजेश पंचोलिया और पारस चित्तौड़ा की रिपोर्ट…


उदयपुर। हुमड़ भवन में विराजित आचार्यश्री वर्धमान सागरजी महाराज की सुशिष्या महायशमति माताजी ने रविवार को दो परिवारों के मान-सम्मान की सशक्त माध्यम बेटियों के लिए विशेष प्रवचन देते हुए कहा कि शब्द मेरे पास हैं, लेकिन बोलना गुरु ने सिखाया, हाथ मेरे पास हैं लेकिन लिखना गुरु ने सिखाया, पैर मेरे पास हैं लेकिन चलना गुरु ने सिखाया और श्वास मेरे पास है लेकिन जीना गुरु ने सिखाया। आज के दौर में महिला समाज किस प्रकार धर्म के प्रति जागृत हो, इस पर चर्चा करते हुए महायशमति माताजी ने कहा कि पूरी महिला समाज हमारी प्राचीन सभ्यता को कैसे अपनाएं और धर्म के प्रति कैसे जागृत रहें।

आज के इस फैशन के युग में हमारे पास बहुत से भौतिक साधन उपलब्ध हो चुके हैं और इस फैशन युग में महिला समाज की लाज लुटती जा रही है। हमारी संस्कृति खत्म होती जा रही है। इतना ही नहीं, हमें अपने जीवन को भी खोना पड़ रहा है। बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लगा हुआ है आज पूरी समाज के बीच में की, कि क्यों हम अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं और हमें अपने जीवन से भी हाथ धोना पड़ रहा है।

इसका केवल ही एक ही कारण है आज का फैशन युग। हम भूल गए हैं कि हमारी लाज क्या है, हम भूल गए हैं कि हमारे संस्कार क्या हैं, हम भूल गए कि हमारा परिवार कैसा है, हमारे गुरु कैसे हैं और हमारे भगवान कैसे हैं। हम सब कुछ हम भूलते चले जा रहे हैं। भारतीय संस्कृति में महिलाओं का कार्य क्षेत्र घर पर ही बताया गया है लेकिन आज महत्वपूर्ण क्या है नौकरी या जॉब।

उच्च शिक्षा को ग्रहण करके हम बड़ी- बड़ी जॉब नौकरियों को ढूंढने में लगे हुए हैं। उसके पीछे हमें घर परिवार छोड़ना पड़ता है, संस्कारों को छोड़ना पड़ता है। क्योंकि जॉब करना है तो अकेले जाना है। पहले घर पर मांगलिक कार्यक्रमों में घर की महिलाएं भोजन बनाती थीं, नाच-गाने के के लिए परिवार जन होते थे। अब समय बदल गया। भोजन बनाने के लिए भाड़े के लोगों को बुलाया जाता है और घर की महिलाएं नाचती हैं।

बाहरी हवा से बचने की जरूरत

उन्होंने कहा कि महिलाओं में चार पवित्र रिश्ते बताये गये हैं। पहला मां, धर्मपत्नी, बेटी और बहन। मां के रिश्ते का स्थान सर्वोच्च होता है। धर्मपत्नी घर परिवार सम्भालने के साथ ही पति से भी जुड़ती है और उसे धर्म कार्यों के साथ भी जोड़ती है। वो पति परिवार और स्वयं को धर्म से जोड़ती है इसलिए वह धर्मपत्नी कहलाती है।

मां की तरह ही धर्मपत्नी बहन और बेटियों के प्राय: पराया धन माना जाता है। असल में ऐसा होता नहीं है। ऐसी कितनी ही महान महिलाएं हैं जिन्होंने कभी खुद का परिवार तो नहीं बसाया लेकिन खुद के कर्म, ज्ञान, ध्यान और धर्म से कुल का मान- सम्मान बढ़ाया। महिलाओं को आज जागने की आवश्यकता है।

खुद को संस्कारित करके बाहरी हवा से बचने की आवश्यकता है। इस उद्देश्य के साथ आप अपना जीवन यापन करेंगे तो आपके जीवन में संस्कारों का बीजारोपण होगा और जीवन सफल बनेगा। पहले खुद संस्कारित बनें, बाद में बच्चों में संस्कार निर्माण करें।

धर्म प्रभावना के लिए जीवन का स्वच्छ और निर्मल होना जरूरी – आचार्य वर्धमान सागरजी

आचार्य शिरोमणि श्री वर्धमान सागरजी महाराज ने धर्म सभा में कहा कि हमारे धर्मग्रन्थों ने, हमारे आचार्यों ने धर्मग्रन्थों का जो स्वरूप बताया है, उसे धारण करने से हम धर्म प्रभावना की बात कर सकते हैं, धर्म योग्यता की बात कर सकते हैं। धर्म प्रभावना के लिए दान, तप, जिन पूजा व विद्या के अतिशय से धर्म की प्रभावना कर सकते हैं।

आचार्यश्री ने कहा कि आज के युवाओं का झुकाव व्यसनों की ओर बढ़ता जा रहा है। हम समझते हैं कि व्यसनों की संगत जो हमारे युवा समाज में आ रही है, उसका एक बड़ा माध्यम टेक्नोलॉजी मीडिया है। इसके द्वारा ऐसे- ऐसे प्रसंग प्रस्तुत किया जाते हैं जिनके कारण युवाओं के जीवन में बुराइयां पैदा होती जा रही हैं और जिसके जीवन में बुराई आ गई, वह धर्म की प्रभावना कैसे करेगा।

धर्म की प्रभावना के लिए तो जीवन को स्वच्छ और निर्मल बनाना पड़ेगा। वो बातें हमें जीवन में अपनानी पड़ेंगी, जो भी धर्म की प्रभावना करने का मन रखते हैं। उन्हें पहले अपने जीवन को धर्ममयी बनाना होगा। ऐसा करेंगे तो आपके धर्ममयी जीवन से और भी प्रेरणा लेकर धर्म प्रभावना का पुण्य कार्य करेंगे।

हुए धार्मिक कार्यक्रम

प्रात:कालीन धर्मसभा के प्रारम्भ में आचार्यश्री के पादप्रक्षालन, शास्त्र भेंट, मंगला चरण दीप प्रज्वलन जैसे विभिन्न मांगलिक कार्यक्रम हुए। इस दौरान मुख्य रूप से समाज के श्रेष्ठीजनों में शांतिलाल वेलावत, सुरेशचन्द्र पद्मावत, जनकराज सोनी, देवेन्द्र छाप्या प्रकाश सिंघवी और पारस चित्तौड़ा सहित समाज जन उपस्थित थे।

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