भोपाल में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री प्रमाणसागर ने भावनाओं के महत्व और अनुशासन पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जीवन में भावनाओं का नियंत्रण ही हमारी चेतना और कार्यक्षमता को ऊंचाई प्रदान करता है। भावनाओं का अनुशासन न होने पर जीवन में संघर्ष और तनाव उत्पन्न होता है। पढ़िए अविनाश जैन की रिपोर्ट…
भोपाल (अवधपुरी)। धर्मसभा में मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि जीवन जब यांत्रिक और मशीनी बन जाता है, तो उसमें मानवीय संवेदनाएँ समाप्त हो जाती हैं। भावनाएँ जीवन को नई तरंग देती हैं और यदि प्रबल हों तो बड़े कार्य भी सरलता से संपन्न होते हैं।
मुनि श्री ने बताया कि जैसे नदी का नियंत्रित बहाव धरती को हरा-भरा करता है, वैसे ही नियंत्रित भावनाएँ जीवन को कल्याणकारी बनाती हैं। लेकिन अनियंत्रित भावनाएँ तनाव और विनाश उत्पन्न कर सकती हैं। उन्होंने भावनाओं पर अनुशासन और संयम की आवश्यकता पर जोर दिया।
मुनि श्री ने कहा कि घर में बुजुर्गों का अनुशासन और भावनाओं का संतुलन जीवन को सुंदर और शांतिपूर्ण बनाता है, जबकि अनुशासन और भावनात्मक संतुलन न होने पर घर संघर्ष और तनाव का केंद्र बन जाता है।
उन्होंने क्रोध के उदाहरण से समझाया कि नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में परिवर्तित किया जा सकता है। क्रोध को अनुशासित कर क्षमा और साहस में बदला जा सकता है। मुनि श्री ने भावनाओं के नियंत्रण को जीवन रूपांतरण का माध्यम बताया।













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