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धर्म तो कमाएं धर्म से कभी कमाने की न सोचें-मुनिश्री सुधासागर जी महाराजः मुनिश्री ने धर्म और जीवन दर्शन पर प्रभावी मार्ग दर्शन किया


निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी सागर में विराजित हैं। वे जैन धर्म और जैन समुदाय को धर्म और जीवन दर्शन की सीख दे रहे हैं। मुनिश्री के प्रवचनों को सुनने के लिए बड़ी संख्या में जैन समाज के गुरु भक्त उपस्थित रहते हैं। पढ़िए सागर से राजीव सिंघई की यह खबर…


सागर। निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी यहां विराजित होकर जैन धर्म और जैन समुदाय को धर्म और जीवन दर्शन की प्रभावी सीख दे रहे हैं। उनके प्रवचनों को सुनने के लिए सकल जैन समाज के श्रावक-श्राविकाएं बड़ी संख्या में उपस्थित रहते हैं। गुरुवार को अपने प्रवचन में मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि इस सृष्टि में कोई भी अच्छी वस्तु नहीं है, इस सृष्टि में अच्छे की कामना करना है तो उपलब्ध होने वाला नहीं, मृग मरीचिका के समान सुख नहीं है, दुनिया में सुखाभ्यास है। हम दुनिया से बाहर भी तो नहीं जा सकते और दुनिया कभी अच्छी हो नहीं सकती।

जिंदगी स्वतः अशुद्ध

जिंदगी का कभी हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि, जिंदगी तो स्वतः ही अशुद्ध है। सब तरफ देखो कोई न कोई अशुद्धि है और अशुद्धियों की संभावना है और पूरी खोज करने के बाद कहीं से भी कोई वस्तु ऐसी नहीं मिली जो अंधकार को निकालती हो।

जिंदगी को सूर्य और चंद्रमा बनाइए

अतः सिद्ध ये हुआ संसार का स्वभाव अंधकारमय है। हर वस्तु अंधकार में है लेकिन, एक में प्रकाश है सारे अंधकार को मिटाने की ताकत है। इसलिए कहा कि जिंदगी को तारागढ़ मत बनाओ, जिंदगी को सूर्य और चंद्रमा बनाओ। तारागढ़ स्वयं चमकते हैं लेकिन, उनमें अंधकार दूर करने की शक्ति नहीं है।

जिंदगी घट रही है और हम मान रहे खुद को बड़ा

संसार में सबकुछ मिटता हुआ दिख रहा है। कान, हाथ, पैर सबकुछ मिटता हुआ दिख रहा है। अहंकार ही है कि हम बड़े हो रहे हैं, सत्य ये है कि हम छोटे हो रहे हैं। जिंदगी छोटी हो रही है और हम अपने आपको बड़ा मान रहे हैं। हमारे हाथ में छोटी सी जिंदगी है। कोई न कोई कभी न कभी मरेगा।

हवा ने तुम्हें ऑक्सीजन दी, और तुमने…

पूरी दुनिया को हमने मरघट बना दिया। यह पृथ्वी तुम्हारे लिए क्या उपकार करेगी, तुम जन्मते हो तो इस सृष्टि को गंदा करते हो और मरते हो तो गंदा करते हो, कौन तुम्हारा साथ देगा। जिसने तुम्हारा उपकार किया, उसी का तुमने नाश किया। हवा ने तुम्हें ऑक्सीजन दी, तुमने कार्बन डाइऑक्साइड बना दी।

जल का उपकार न भूलें

जल कितनी मेहनत से बनता है, तपता है गर्मियों में तप करके आकाश में उड़ता है, कैसी मुश्किल से उसका खारापन गया। जैसे ही जल आकाश से गिरा तुमने पीकर उसे मलमूत्र बना दिया। कहां तक करे जल तुम पर उपकार।

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