जैन इतिहास में अनन्य योगदान देने वाले डॉ. हुकमचंद भारिल्ल का रविवार को निधन हो गया। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…
इंदौर। लगता है समाज पर कुछ बड़ा उपसर्ग हो रहा है। पहले जगद्गुरू स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामीजी और अब एक महान आध्यात्मिक विद्वान डॉ.हुकमचंद भारिल्ल का अचानक देवलोक गमन हो जाना जैन जगत को शून्य की ओर धकेल रहा है। सामाजिक संसद इंदौर के अध्यक्ष राजकुमार पाटोदी, मंत्री डॉ. जैनेन्द्र जैन, फेडरेशन के अध्यक्ष राकेश विनायका, महावीर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, हंसमुख गांधी, टी के वेद, मीडिया प्रभारी संजीव जैन संजीवनी, राजेश जैन दद्दू, राजीव जैन बंटी, परवार समाज महिला मंडल की अध्यक्ष मुक्ता जैन एवं समस्त संगठन सोशल ग्रुप परिवार ने भारिल्ल के निधन पर शोक व्यक्त किया है।
जानें डॉ.भारिल्ल के बारे में
जैन धर्म की अनेक पुस्तकों के रचियता डॉ. हुकमचंद भारिल्ल का जन्म ज्येष्ठ कृष्णा अष्टमी विक्रम संवत् 1992 (25 मई 1935 ईस्वी) को ललितपुर जिले के बरौदास्वामी गांव में हुआ था। आपके पिताश्री हरदासजी एवं मातुश्री पार्वतीबाई थीं। उस समय उस गांव में 200 घरों की बस्ती थी जिनमें जैनियों के घर पांच-छह ही थे। वे सभी परिवार धार्मिक संस्कार वाले थे। आप तीन भाई और एक बहन हैं। डॉ. भारिल्ल सदैव चिन्तनशील, विचारशील और प्रभावशील बने रहे।
आपकी प्रारंम्भिक शिक्षा गांव में हुई। सुविधा न होने पर वे अपने मित्रों सहित चार-पांच किलोमीटर दूर मनोरा गांव में पढ़ने जाने लगे। सन् 1946 की दीपावली के तत्काल बाद वीर विद्यालय पपौरा में अध्ययन के लिए चले गए। उसके पश्चात् सन् 1947 जुलाई में गोपाल दिगम्बर जैन विद्यालय, मुरैना में शास्त्रीय अध्ययन करने लगे। आपकी शिक्षा मुरैना एवं राजखेड़ा में सम्पन्न हुई। आपने सन् 1954 में शास्त्री व न्यायतीर्थ परीक्षा उत्तीर्ण की। आपने पण्डित मक्खनलाल शास्त्री, नन्हेलाल जी शास्त्री एवं पण्डित राजधर जी व्याकरणाचार्य आदि गुरुओं से गौरवपूर्ण शिक्षा प्राप्त की। डॉ. भारिल्ल अपनी विद्वता, ओजस्विता और ज्ञान के कारण सम्पूर्ण देश के प्रत्येक क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। डॉ. भारिल्ल का बीसवी शताब्दी के जैन इतिहास मे अनन्य योगदान रहा है।













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