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मन का दुरुपयोग न करें अच्छा सोचें, अच्छा बोले अच्छे कार्य करें: आर्यिका सिद्ध श्री माताजी के प्रवचन में मन की गति का रहस्य 


84 लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव पर्याय प्राप्त हुई है और सबसे बड़ी बात की मन मिला है। पंडित दौलत राम जी अपने छहढाला ग्रंथ में कहते हैं कि मन हर प्राणी के पास नहीं होता है, सिर्फ सेनी पंचेन्द्री जीव और मनुष्य के पास ही मन की शक्ति होती है। सर्वज्ञ देव की दिव्य ध्वनि के माध्यम से जो श्रुत ज्ञान जैनाचार्यों ने प्राप्त किया। यह प्रबोधन आर्यिका सिद्ध श्री माताजी ने दिया। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की यह खबर…


इंदौर। 84 लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ मानव पर्याय प्राप्त हुई है और सबसे बड़ी बात की मन मिला है। पंडित दौलत राम जी अपने छहढाला ग्रंथ में कहते हैं कि मन हर प्राणी के पास नहीं होता है, सिर्फ सेनी पंचेन्द्री जीव और मनुष्य के पास ही मन की शक्ति होती है। सर्वज्ञ देव की दिव्य ध्वनि के माध्यम से जो श्रुत ज्ञान जैनाचार्यों ने प्राप्त किया उसके अनुसार मनुष्य गति में मन के माध्यम से सोचने समझने की योग्यता प्राप्त हुई है और उसके अनुसार कार्य करने का बल भी मिला हैं। अतः हमें मन का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। जोड़ने को तीन लोक और छोड़ने को तीन चीजें। यह बातें श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर समर्थ सिटी में आर्यिका मां सिद्ध श्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहीं।

उन्होंने कहा कि जोड़ने को तो हमारे पास पूरे तीन लोक की धन संपदा और द्रव्य सामग्री है, जिसे प्राप्त करने के बाद भी शायद हमारा मन संतुष्ट नहीं हो पायेगा और पाने की लालसा बनी रहेगी परंतु, मानव के पास छोड़ने की मात्रा तीन वस्तु ही है राग, द्वेष और मोह। यदि हमने मात्र इन तीन चीजों को छोड़कर धैर्य धारण करके मन की पवित्रता को बनाते हुए अपने चंचल मन को अच्छे कार्यों में प्रवृत्त कर दिया तो हमारा मानव जीवन लेना सफल हो जाएगा अन्यथा हमें पुनः 84 लाख योनियों में भयंकर दुःख सहने के लिए जाना ही पड़ेगा।

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