अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने बारह भावना प्रवचन श्रृंखला में 11वें दिन धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि संसार की चारों गतियों में सुख नहीं है। लोक कर्म प्रधान है। इसे किसी ने नहीं बनाया है। मैं संसार में परिभ्रमण क्यों कर रहा हूं, मेरी अहम बुद्धि क्यों है, दूसरी की शिकायत क्यों करता हूं, इन सभी बातों का चिंतन करना ही लोक भावना है। पढ़िए सारांश जैन और भव्य जैन की विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में बारह भावना प्रवचन श्रृंखला के 11वें दिन लोक भावना पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि संसार की चारों गतियों में सुख नहीं है। लोक कर्म प्रधान है। इसे किसी ने नहीं बनाया है। मैं संसार में परिभ्रमण क्यों कर रहा हूं, मेरी अहम बुद्धि क्यों है, दूसरी की शिकायत क्यों करता हूं, इन सभी बातों का चिंतन करना हीलोक भावना है।

तीनों लोक के स्वरूप और उसमें होने वाली घटनाओं को भी देखना, जानना और उनको पहचानना और अपने सिद्ध स्वरूप का चिंतन करना चाहिए। लोक में किसी से कोई आशा नहीं रखनी चाहिए क्योंकि सबका अपना स्वरूप और कर्म है। यात्रा करते हैं तो उसमें जो अनुभव आते हैं, तो उनमें से खराब अनुभवों को पुनः नहीं करने का संकल्प करते हैं। उसी प्रकार संसार में जिन कारणों से आत्मा को परमात्मा बनने में बाधा आ रही है, उन कारणों को छोड़ने का कार्य करना चाहिए।

अपने आपको ही देखें
मुनि श्री ने इसे उदाहरण से समझाते हुए कहा कि दो शिष्य सामयिक कर रहे थे। एक को नींद आ गई तो दूसरे ने गुरु जी से जा कर कह दिया। गुरु जी यह सामयिक में सो रहा था तो गुरु जी ने कहा तो बताओ कि तुम क्या कर रहे थे? तुम इसे देख रहे थे तो इसका मतलब यह है कि तुम भी सामयिक नहीं कर रहे थे। लोक में हम एक-दूसरे को देख रहे हैं और स्वयं को देखने का समय नहीं है। इसलिए ही लोक का परिभ्रम कर रहे हैं। दूसरों छोड़कर अपने आप को देखना ही वास्तव में लोक भावना का चिंतन है। धर्म सभा में क्षुल्लक अनुश्रमण सागर महाराज जी उपस्थित थे। धर्म सभा का संचालन ब्र. तरुण भैया ने किया।













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