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कार्य ऐसा करो कि संसार में आना और जाना छूट जाए: मुनिश्री विशालसागर जी महाराज ने की कठिन साधना, पारणा कर अन्न किया ग्रहण 


दिगंबर मुनि श्री विशाल सागर जी ने 72 दिवसीय त्रिकाल चौबीसी व्रत किया। इसमें मात्र 26 दिन जल, मट्ठा मुनुक्का, छेना लिया। उनोदर तप का पारणा कर 13 सितंबर को अन्न ग्रहण किया। इंदौर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


इंदौर। सुदामा नगर में चातुर्मास कर रहे आचार्य श्री विशद सागर जी के संघस्थ मुनि श्री विशाल सागर जी महाराज ने लगातार 72 दिन के त्रिकाल चौबीसी व्रत-उपवास की साधना के बाद 13 सितंबर को 72 दिनों के बाद अन्न और सभी रस फल आहार में लिए। इसके पूर्व 72 दिन में कभी-कभी 3 निर्जल उपवास किए। इनमें भी मात्र 26 दिनों में केवल जल, मुनक्का, छेना और बादाम उनोदर अल्प आहार लिया। अजय पंचोलिया इंदौर ने बताया कि मुनि श्री विशाल सागर जी ने इस अवसर पर पारणा के पूर्व कहा कि उपवास करने से शरीर हल्का हो गया। अभी 10 लक्षण पर्व में 12 दिनों में मैं 9 दिन निर्जल उपवास कर वैशाली नगर, सुदामा नगर, कांच मंदिर मल्हारगंज, 20 पंथी मंदिर मंदिरों के दर्शन कर वैशाली नगर की यात्रा की। भगवान से एनर्जी मिलती है।

कार्य ऐसा करो कि संसार में आना और जाना छूट जाए। श्रद्धा से भगवान को स्मरण करने से रोग पीड़ा भी दूर हो जाते हैं। कल डॉक्टर ने परीक्षण किया, सब कुछ उन्हें नॉर्मल मिला। मुनि श्री ने 3 जुलाई से 12 सितंबर 72 दिवसीय उपवास साधना में गेहूं, चावल, चना, मूंग आदि सभी प्रकार के अनाज, सभी प्रकार के फल, हरी सब्जी, मिर्च-मसालों, घी, नमक, दूध, बूरा, तेल, दही आदि छहों रस, सूखे मेवे, छुआरा, अखरोट, मखाना, काजू आदि ड्राई फूड का त्याग कर 48 घंटे, 72 घंटे के निर्जल उपवास के बाद भी सभी प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजनों को छोड़कर नीरस, अल्प आहार लेकर ऊनोदर तप की साधना की। व्रत साधना में मात्र छेना, मट्ठा, दाख जल आदि सीमित खाद्य सामग्री ही ली।

सम्मेद शिखर की 25वीं टोंक की 300 बार चरण वंदना की 

जयपुर नगर गौरव 52 वर्षीय सन 2005 में आचार्य श्री विशद सागर जी से दीक्षित मुनि श्री विशाल सागर जी ने गृहस्थ और मुनि अवस्था के 26 वर्षों में 51 प्रकार के व्रतों में अभी तक 5 हजार 325 उपवास पूर्ण किए हैं। इसमें प्रमुख रूप से तीस चौबीसी के 720 व्रत उपवास, चतुर्दशी के 344 उपवास, सोलह कारण के 512 आदि पूर्ण कर सहस्र नाम के 410 उपवास होकर व्रत जारी हैं। काय क्लेश तप साधना में 5 बार से अधिक 100 से अधिक घंटे का तप, अधिकतप 157 घंटे का तप सम्मेद शिखर जी में किया है। सम्मेद शिखर की 25वीं टोंक की 300 बार चरण वंदना मात्र 10 माह में की और साथ ही प्रत्येक टोंक की 1008 परिक्रमा भी लगाई। सम्मेद शिखर की 55 किमी संपूर्ण पर्वत की 5 बार वंदना की। अन्य अनेक तीर्थ अतिशय क्षेत्र पर भी कठोर तपस्या की। इस अवसर पर सैकड़ों भक्तों ने महा पारणा में तपस्वी मुनिराज को आहार देकर पुण्य अर्जित किया। आहार के पूर्व मुनि श्री ने उपदेश में बताया कि प्रभु की भक्ति से शक्ति मिलती है।

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