प्रकार के रास्ते होते हैं एक रास्ता जो मंजिल तक पहुंचाता है, एक रास्ता वह है जो रास्तों तक पहुंचाता है। अनादिकाल से आज तक अपन सबको जिनवाणी मां नहीं मिली सो बात नहीं है, गुरुओ को माना सो बात नही है, सबकुछ किया है लेकिन इनके जो दुश्मन है खोटे देव-शास्त्र-गुरु इनको समझा ही नही है। समयसार में हमें आत्मा की बात तो बताई गई लेकिन अनात्मा क्या है ये नहीं बताया गया इसलिए जितने समयसार पढ़ने वाले है ये अध्यात्म का ज्ञान रखतें है लेकिन अपनी जिंदगी को पापों से बचा नही पाते। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…
कुंडलपुर। दो प्रकार के रास्ते होते हैं एक रास्ता जो मंजिल तक पहुंचाता है, एक रास्ता वह है जो रास्तों तक पहुंचाता है। अनादिकाल से आज तक अपन सबको जिनवाणी मां नहीं मिली सो बात नहीं है, गुरुओ को माना सो बात नही है, सबकुछ किया है लेकिन इनके जो दुश्मन है खोटे देव-शास्त्र-गुरु इनको समझा ही नही है। समयसार में हमें आत्मा की बात तो बताई गई लेकिन अनात्मा क्या है ये नहीं बताया गया इसलिए जितने समयसार पढ़ने वाले है ये अध्यात्म का ज्ञान रखतें है लेकिन अपनी जिंदगी को पापों से बचा नही पाते।
यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि बिना गुरुओं के जिन्होंने समयसार पढ़ा है वे अपनी जिंदगी में कभी संयम नहीं लेंगे, मुनि, ऐलक क्षुल्लक का तो सवाल ही नहीं प्रतिमाधारी भी नहीं बनेंगे क्योंकि उसने समयसार पढ़ा है लेकिन यह नहीं पढ़ा कि समयसार तक पहुंचने के लिए बाधक तत्व क्या हैं? दुश्मन क्या है, विपक्ष क्या है? पुण्य को समझने के पहले पाप को समझो अच्छाई को समझने के पहले बुराइयों को समझो। गुरु बनाना कि मुझे अच्छाइयों का, मुझे धर्म का, पुण्य का, तत्व का ज्ञान नही, मुझे चाहिए कुतत्व का ज्ञान कराने वाला, कुदेव कुशास्त्र कुगुरु क्या है, बुराइयां क्या है ये जानने के लिए गुरु बनाया जाता है।
राग-द्वेष की चर्चा न करें
जिन-जिन ने अच्छाइयां जानने के लिए गुरु बनाया है वे कभी जिंदगी में कभी अच्छे नहीं बन पाएंगे। अच्छाइयों को समझने के लिए सम्यक दर्शन-ज्ञान-चरित्र को, आत्म तत्व को, पंचपरमेष्ठी को समझने के लिए तुम गुरु बनाओगे तो कभी तुम अच्छे नही बन पाओगे, न धर्मात्मा बनोगे, न मुनि बनोगे, कुछ नही बन पाओगे, जैसे आज के समयसार पढ़ने वाले, कुछ नही बन पाए क्योंकि समयसार में अच्छाई ही अच्छाई भरी है, शुद्ध स्वरूप भरा है। पूरे समयसार में कहीं राग द्वेष कषाय की चर्चा नही, वहां तो शुद्ध स्वरूप की चर्चाएं है। तुम क्यों नहीं बन पा रहे धर्मात्मा क्योंकि तुमने धर्म की बात पढ़ ली, तुम अच्छे क्यों नहीं बन पा रहे क्योंकि तुमने अच्छाइयां पढ़ ली, तुम मुनि क्यों नहीं बन पा रहे हो क्योंकि तुमने मुनि को समझ लिया है। वह मंदिर किस काम का जिस मंदिर के कारण हमारी आत्मा मलिन हो जाए, कषायी, राग द्वेष हो जाये क्योकि मंदिर तो वो है जहां गाय और शेर एक घाट पर पानी पीते है। आज तो दो गाएं एक घाट पर पानी नही पी पा रही हैं, भाई भाई लड़ रहे हैं मंदिर के लिए।
आत्मा को निर्मल करें
भगवान के दर्शन से आत्मा निर्मल होना चाहिए और दर्शन से ही मलिन हो जाये तो ऐसे भगवान से हमें क्या लेना देना है, हमने तो भगवान को इसलिए बैठाला था कि इनके दर्शन से हमारी आत्मा निर्मल हो जाएगी। हमें तो भगवान के दर्शन से कषाय हो गई क्योंकि ये भगवान दुश्मन ने बैठाले है। कम से कम धर्म के कारण से कषाय मत करो, कषाय करना ही है तो पापियों से करो, दुश्मनों से करो, संसारियों से करो लेकिन कभी धर्म व धर्मात्मा से कषाय मत करो। मंदिरों को मत बांटो, जो मंदिरों को बांटेगा वह ऐसे बंट जाएगा जैसे इडली डोसा की चटनी बंटती है। मत बांटो गुरुओ को, साधुओ को लेकर कषाय मत करो, नही तो सातवाँ नरक भी कम पड़ जाएगा। बने रह जाओगे जैनी, व्रती, धर्मात्मा, अहंकार मत करना तुमने वो पाप करते हो कि एक संघ के साधुओ में तक बंटवारा करते हो। सभी साधुओ के प्रति अपना साम्यभाव रखों, गुणवान है तो अपना वात्सल्य भाव रखो।
किसी वेदी को देखकर क्लेश न करें
किसी वेदी, भगवान को देखकर यदि तुम्हारे मन में क्लेश हो रहा हो, तुम्हारे मन में कषाय जाग रही हो, समझ लेना संसार के सबसे बड़े पापी तुम हो। इतने पापी, कषायी मत बनो कि आपसी की दुश्मनी तुम मंदिरों और वेदियों पर निकालो, ये वेदी तुम्हारी, ये मंदिर हमारा। इन परिणामों से निधत्त निकाचित कर्मो का बन्ध होता है। साधुओ को नही मानना वाला श्रेष्ठ है उससे जो साधुओं में भेद करता है, वो है सबसे बड़ा महापापी। जिनेन्द्र मेरे हैं और मैं जिनेंद्र देव का, ऐसे निर्मल परिणाम आ जाये तो ये मंदिर धन्य हो जाये।













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