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साधु संतों के सानिध्य से विकार होते हैं नष्ट : जैन मंदिर में नित्य होते हैं मुनिराज जारी हैं प्रवचन


वर्षायोग के चार माह धर्म ध्यान, पूजन, तप, स्वाध्याय, भक्ति एवं साधना के लिए सबसे उत्तम समय रहता है। इस समय का सभी श्रावकों को सदुपयोग करना चाहिए। इस अवसर पर यदि साधु संतों का समागम मिल जाएं तो सोने पर सुहागा है। साधु-संतों की महिमा उनके आध्यात्मिक ज्ञान, भक्ति, और प्रेम के संदेश में निहित है। यह प्रबोधन मुनिश्री विलोकसागरजी ने दिए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


मुरैना। वर्षायोग के चार माह धर्म ध्यान, पूजन, तप, स्वाध्याय, भक्ति एवं साधना के लिए सबसे उत्तम समय रहता है। इस समय का सभी श्रावकों को सदुपयोग करना चाहिए। इस अवसर पर यदि साधु संतों का समागम मिल जाएं तो सोने पर सुहागा है। साधु-संतों की महिमा उनके आध्यात्मिक ज्ञान, भक्ति, और प्रेम के संदेश में निहित है। यह उद्गार बड़े जैन मंदिर में चातुर्मासरत मुनिश्री विलोक सागर महाराज ने धर्मसभा में व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि प्रेम के संदेश समाज के लिए मार्गदर्शन का काम करते हैं, लोगों को धार्मिकता और सद्गुणों की ओर प्रेरित करते हैं। साथ ही अपने आचरण से, अपनी चर्या से, अपने उपदेशों से दूसरों के लिए उदाहरण स्थापित करते हैं। हम जिस प्रकार की संगति में रहते हैं, उसी के अनुसार हमारे विचार और व्यवहार हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि यदि हम बुरे लोगों के साथ रहते हैं तो उनके अगुण हमारे अंदर प्रवेश कर जाते हैं। जिस प्रकार अग्नि के पास में पानी रखने पर वह गर्म हो जाता है, उसी प्रकार बुरे व्यक्तियों की संगति से उनके अगुण हमारे अंदर आ जाते हैं।

संगति द्वारा व्यक्ति में सद्गुण आते हैं

साधु संतों की संगति से हमारा मन निर्मल रहता है। हमें प्रभु भक्ति की प्रेरणा मिलती है। साधु-संतों के प्रभाव से हमें अच्छे कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त होती है और हमारा मन बुरे कर्म, बुरे विचारों से मुक्त हो जाता है। साधु-संतों की संगति का व्यक्ति के चरित्र पर बहुत बड़ा एवं महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। वह संगति ही है, जो आपके अवगुणों को गुणों में परिवर्तित कर सकती है। संगति द्वारा व्यक्ति में सद्गुण तो आते हैं, किंतु वहीं यदि संगति अच्छी ना हो, तो व्यक्ति के अच्छे गुण भी नष्ट हो सकते हैं। मुनिश्री ने बताया कि बुरी संगति ना केवल हमारे चरित्र, स्वभाव एवं आचरण को खराब करती है, बल्कि समाज में हमारा मान – सम्मान एवं प्रतिष्ठा भी धूमिल हो जाती है। यही कारण है कि हमारे बड़े, गुरु जन एवं हमारे हितेषी सदैव हमें अच्छे लोगों के साथ रहने की सलाह देते हैं। अच्छी संगति का जीवन में बहुत महत्व है। यह व्यक्ति के विकास, चरित्र निर्माण और सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बुरी संगति से व्यक्ति पतन की ओर जाता है, जबकि अच्छी संगति उसे महान बनाती है।

कुसंगति विनाश की ओर ले जाती है

उत्तम स्वभाव वाले व्यक्ति पर कुसंगति का असर नहीं होता क्योंकि उनका स्वभाव और चरित्र मजबूत होता है। वे अपने सिद्धांतों और मूल्यों पर अडिग रहते हैं और गलत संगति का प्रभाव उन पर नहीं पड़ता। कुसंगति का मानव जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। यह व्यक्ति को गलत रास्ते पर ले जाती है, उसकी बुद्धि को भ्रष्ट करती है और उसे विनाश की ओर ले जाती है। कुसंगति के कारण व्यक्ति अपने परिवार और समाज से दूर हो जाता है और उसके जीवन में नकारात्मक परिवर्तन आ सकते हैं।

जैन मंदिर में गूंज रहा है महामंत्र णमोकार

नगर के बड़े जैन मंदिर में मुनिराज विलोक सागर एवं मुनिराज विबोध सागर महाराज का आध्यात्मिक वर्षायोग चल रहा है। प्रातः से ही जैन मंदिर में महामंत्र णमोकार की गूंज सुनाई देती है। प्रतिदिन प्रातःकालीन वेला में मुनिश्री विबोध सागर महाराज साधर्मी बंधुओं को योग की साधना कराते हुए योगाभ्यास कराते हैं। युगल मुनिराजों के सानिध्य में श्री जिनेंद्र प्रभु का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन होती है। तत्पश्चात मुनिश्री विलोक सागर महाराज जैनागम के सैद्धांतिक ग्रंथ समयसार एवं रयणसार का स्वाध्याय कराते हुए उसका अर्थ समझाते हैं। दोपहर में पुनः धर्म की कक्षाएं लेते हैं। शाम को शंका समाधान कार्यक्रम होता है। गोधूली वेला में भक्ति एवं आरती के पश्चात शास्त्र सभा में ब्रह्मचारी संजय भैया (झापन तमूरा वाले) दमोह के प्रवचनों से सकल जैन समाज लाभान्वित होती है। प्रतिदिन मुनिश्री के प्रवचन होते हैं।

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