साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम सनातन संस्कृति की प्रस्तोता दिगम्बरत्व पर चर्चा करने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति में जितने भी वेद, पुराण हैं, उन सभी में दिगम्बरत्व को यथास्थान बहुमान दिया है। पढ़िए राजेश रागी की विशेष रिपोर्ट…
कुम्हारी(दमोह)। साइंस ऑफ लिविंग के सत्र में मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने कहा कि इस सत्र में हम सनातन संस्कृति की प्रस्तोता दिगम्बरत्व पर चर्चा करने का प्रयास करेंगे। भारतीय सनातन संस्कृति में जितने भी वेद, पुराण हैं, उन सभी में दिगम्बरत्व को यथास्थान बहुमान दिया है। यह निर्विकार दिगम्बर मुद्रा ही प्रमुख कारण है, जिससे यह भारतीय सनातन संस्कृति विश्व गुरु के रूप में अपनी पहचान अनादि काल से बनाए हुए हैं। सम्पूर्ण विश्व आज भी आश्चर्य के साथ इस विषय पर चिन्तन करता है कि निर्विकार अवस्था के साथ यह कैसा जीवन है? वासना विजय का यह स्वरूप आज भी वैसा ही है, जैसा कि भगवान महावीर स्वामी का था। इस मुद्रा के माध्यम से किसी भी प्राणी मे राग की, विकार की, वासना की उत्पत्ति नहीं होती है, बल्कि वैराग्य की उत्पत्ति में यह मुद्रा सशक्त माध्यम है।
सद्दर्शन से ही सद्गति की प्राप्ति
आचार्य श्री ने कहा कि, ” कारण सदर्शम् कार्यम् ” अर्थात कारण के अनुरूप ही कार्य होता है। सद्दर्शन से ही सद्गति की प्राप्ति होती है। ऐसी वीतरागी दिगम्बर मुद्रा का दर्शन पाप का नाश करने वाला है। साथ ही साथ स्वर्ग व मोक्ष का साधनभूत है। जिस प्रकार छिद्र सहित हाथों में जल ज्यादा देर तक नहींं ठहरता है अर्थात् नष्ट हो जाता है, उसकी प्रकार इस वीतराग नग्न मुद्रा के दर्शन से वन्दना आदि करने से पाप कर्म का तीव्र उदय भी अधिक समय तक नहीं ठहरता। ऐसी प्रशान्त दिगम्बर मुद्रा का दर्शन पुण्य संचय करने वाला होता है और देवता भी इसके लिए तरसते हैं। विश्व विजेता सिकन्दर भी जब भारत आया था, तब वह भी इस वीतराग मुद्रा को देख मन्त्र मुग्ध हो गया था। आप ही लोग कहते हो ” हे गुरुवर! शाश्वत सुख दर्शक यह नग्न स्वरूप तुम्हारा है जग की नश्वरता का सच्चा दिग्दर्श कराने वाला है।”
जहां राग है, वहीं सुख नहीं
सम्पूर्ण विश्व आज सुख चाहता है, शान्ति चाहता है और इस संसार में अगर शान्ति है, तो वह है वीतरागी सन्तों के पास, चलते-फिरते भगवन्तो के पास। जहां राग है, वहां सुख नहीं। वीतरागी संत तुम्बी के समान है। जिस प्रकार सुखी तुम्बी पानी में नहीं डूबती और उसका सहारा लेने बाला भी नहीं डूबता, ठीक उसी प्रकार, वीतरागी देव, गुरु हुआ करते हैं। जो इनका सहारा ले लेता है, वह भवसागर में कभी डूबता नहीं पार उतर जाता है। यह दिगम्बर मुद्रा देह से देहातीत होने की यात्रा का द्योतक है। वेदों में, पुराणों में इस दिगम्बर अवस्था को मंगलकारी माना है। इस मुद्रा का दर्शन मात्र कार्य की सफलता का द्योतक है। आचार्यों ने इसे यथाजात रूप कहा है अर्थात् जैसा जन्म के समय बालक होता है, वैसा ही यह स्वरूप है। दिशाएं हैं जिनकी अम्बर, वही सही दिगम्बर है। जिनके पास ना अम्बर (वस्त्र) है और ना आडम्बर (परिग्रह) है, वही सही में दिगम्बर है।
नग्न मुद्रा पूजनीय
उन्होंने कहा कि महाभारत के युद्ध में नारायण श्री कृष्ण ने युद्ध के समय अर्जुन से कहा “देखो पार्थ, उस ओर से दिगम्बर मुनि आ रहे हैं। यह महान मंगलकारी दर्शन होने से हमारी विजय निश्चित है। भारतीय सनातन संस्कृति मे वेदों, ग्रन्थों पुराणों को प्रमाण माना जाता है और सभी में यह निर्विकार नग्न मुद्रा सम्मानीय दृष्टि से पूज्यनीय स्वीकार की गई है। यह मुद्रा ही मुक्ति का साक्षात् कारण है।













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