श्रीफल जैन न्यूज ने अपनी कलम चलाने से पहले समाज के आम और खास व्यक्तियों से बात की। उन्हीं की भावनाओं के अनुरूप यह पत्र सुलह की दृष्टि से लिखा जा रहा। आप इसे बिना भेदभाव की दृष्टि से पढ़ें। इसे समाज हित में ध्यान से पढ़ें और एक सकारात्मक दृष्टि से सोचें। पढ़िए यह विशेष पत्र…
दिगंबर जैन सामाजिक संसद, इंदौर का विवाद निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। अब इस पर विराम की आवश्यकता है। विवाद से व्यक्तिगत असर तो ही रहा है, धर्म, संस्कार और संस्कृति को भी नुकसान पहुंच रहा है। इतिहास के पन्नों में विवाद का यह पन्ना इंदौर जैन समाज पर काला धब्बा है। समाज सेवा की यह होड़ दसअसल अपने अस्तित्व, मान-सम्मान बचाने की बात है। किसी भी प्रकार के दबाव, धन, बल के दबाव और धार्मिक क्षेत्र में शासन-प्रशासन के हस्तक्षेप से यह विवाद नहीं सुलझना चाहिए, अन्यथा यह हमेशा के लिए बना रहेगा। बिना त्याग के यह विवाद सुलझने वाला नहीं है। बात समाज की संसद की है तो इसका निर्णय भी इंदौर समाज के हर एक घर को करना चाहिए।
कौन सच्चा कौन झूठा… इसे छोड़ कर समाज के हित में काम करें। भगवान राम भी जानते थे कि सीता निर्दोष है लेकिन राज्य का अनुशासन बनाए रखने के लिए राम ने सीता का त्याग कर उसे वनवास भेज दिया। तो क्या समाज की एकता, विकास, अखंडता और धर्म की सुरक्षा के लिए हम कोई एक निर्णय पर नहीं आ सकते हैं… क्या हुआ, किसने किया इन सब को छोड़ कर यह निर्णय करना होगा कि समाज की भलाई और एकता किसमें है। आगे भी इस प्रकार की हंसी ना हो तो एक निर्णय सर्वेपरि यही रहेगा कि हम अपना निर्णय मंदिर में प्रभु की प्रतिमा के सामने कर लें। भगवन की प्रतिमा के सामने दोनों गुट के दस-दस लोगों के नाम अलग-अलग दो डिब्बों में डाल दें और एक-एक पर्ची दोनों डिब्बों में से निकालें। जिनका नाम आ जाए, उन दोनों को संसद का मुख्य संयोजक तब तक बना दिया जाए, जब तक चुनाव नहीं होते।
दोनों तब तक समाज का काम मिलकर करें। समाज के अध्यक्ष और अन्य पद का चयन इंदौर जैन समाज का प्रत्येक घर करे। इंदौर जैन समाज का प्रत्येक घर एक सूची बनाए। घर का मुखिया संसद का सदस्य बने, उसका परिचय पत्र बने। एक घर का एक वोट हो। संसद को प्रत्येक घर जाकर सदस्य बनाने की जरूरत नहीं है। उसके लिए वह मंदिरों में, समाज के ग्रुप में या अन्य साधनों से सदस्य बनने की अपील करे और इच्छुक व्यक्ति फार्म भर कर संसद का सदस्य बने। फार्म कहां जमा करें तो हर मंदिर में एक डिब्बा रखें और उसमें वह अपना फार्म डाल दे। घर का जो सदस्य संसद का सदस्य बना है, उसकी लिस्ट सार्वजनिक कर दी जाए और 15 दिन का समय दिया जाए कि लिस्ट पर कोई आपत्ति हो तो वह अपनी आपत्ति दर्ज करवा दे।
उसके बाद जैन समाज के वकील, जज, अन्य बड़े सेवानिवृत्त अधिकारी की मौजूदगी या समाज के बड़े लोग जो निष्पक्षता से अपना पक्ष रखते हों, उनसे मिलकर इनकी एक गणना समिति बनाएं और उनके पास अपनी आपत्ति रखें। वह कमेटी निर्णय करके एक नई लिस्ट जारी करे। उसके बाद चुनाव की तारीख घोषित कर दे। जब तक चुनाव नहीं होते हैं, तब तक समाज के धार्मिक और सामाजिक कार्यों में दोनों संसद के अध्यक्ष मुख्य संयोजक बनकर अपना कार्य करें या दोनों गुट के कुछ-कुछ सदस्य लेकर आगे के कार्य करें।
तो निश्चित रूप से आने वाले समय में फिर समाज में इस तरह के संग्राम थमने की उम्मीद है। इसके अलावा और किसी तरीके से संसद संग्राम को शांत करने की कोशिश की गई तो ये दूरियां और बढ़ जाएंगी जो भविष्य के लिए भी खतरा साबित हो सकती हैं। आप पाठकों के पास कोई और रास्ता हो इस संग्राम को शांत करने का तो आप हमें भेजें।













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