दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -83 वास्तविक महानता विनम्रता में ही निहित है : भक्त को भगवान के चरणों में नम्रता और समर्पण के साथ झुकना चाहिए


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 83वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


सबसे लघुताई भली, लघुता ते सब होय।

जैसे दूज का चंद्रमा शीश नवे सब कोय॥


इस दोहे में “लघुता” का अर्थ सिर्फ छोटे या विनम्र होने से नहीं, बल्कि आत्मबोध से भी जुड़ा हुआ है। जब व्यक्ति अपने अहंकार को त्याग देता है और स्वयं को ब्रह्म के अंश के रूप में देखता है, तब उसे वास्तविक आत्मज्ञान प्राप्त होता है। जैसे दूज का चंद्रमा अपने छोटे स्वरूप में भी सभी को शीतलता और शांति प्रदान करता है, वैसे ही जो व्यक्ति अहंकार मुक्त होता है, वह अपने आचरण और ज्ञान से सभी को लाभ पहुंचाता है।

 

वास्तविक महानता विनम्रता में ही निहित है। बड़े से बड़ा ज्ञानी, धनवान या शक्तिशाली व्यक्ति भी यदि अहंकारी हो जाए, तो वह समाज में स्वीकार्य नहीं होता। जबकि जो व्यक्ति सरल, सौम्य और दूसरों के प्रति आदरभाव रखता है, वह सभी का प्रिय बन जाता है। समाज में वही प्रतिष्ठित होता है जो सेवा और समर्पण की भावना से कार्य करता है, न कि जो अपने ऐश्वर्य या शक्ति का प्रदर्शन करता है।

 

इस दोहे में भक्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व छिपा हुआ है। भक्त को भगवान के चरणों में नम्रता और समर्पण के साथ झुकना चाहिए। जैसे चंद्रमा की शीतलता सभी को आकर्षित करती है, वैसे ही भक्त का निःस्वार्थ प्रेम और भक्ति उसे भगवान के समीप ले जाता है।

 

जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए केवल बुद्धिमत्ता या परिश्रम ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि विनम्रता और धैर्य भी अनिवार्य गुण हैं। चंद्रमा की भांति जो व्यक्ति धीरे-धीरे प्रगति करता है और अहंकार से दूर रहता है, वह अपने कार्यों में सफलता प्राप्त करता है।

 

कबीर दास जी का यह दोहा केवल एक साधारण सीख नहीं है, बल्कि जीवन का एक महत्वपूर्ण सत्य प्रकट करता है। लघुता या विनम्रता को केवल बाह्य व्यवहार तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसे हृदय की गहराइयों तक आत्मसात करना चाहिए। जो व्यक्ति स्वयं को छोटा समझता है, वह वास्तव में वृहद् और दिव्य बन जाता है। अहंकार को त्यागकर शुद्ध आत्मा के रूप में जीना ही वास्तविक मोक्ष और जीवन का उद्देश्य है।

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