आदेश्वर पचौरी अब दिगंबर जैन मुनि मुमुक्षु सागर बन गए हैं। चारित्र चक्रवर्ती दिगंबर जैनाचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल परंपरा के पंचम पट्टाधीश राष्ट्र गौरव वात्सल्य वारिधि आचार्य वर्द्धमान सागर जी महाराज ने मुनि दीक्षा ग्रहण कराई। पढ़िये श्रीफल जैन न्यूज के अशोक कुमार जेतावत की विशेष रिपोर्ट…
धरियावद। नगर के देशव्रती श्रावक पंडित आदेश्वर पचौरी अब दिगंबर जैन मुनि मुमुक्षु सागर बन गए हैं। चारित्र चक्रवर्ती दिगंबर जैनाचार्य 108 श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल परंपरा के पंचम पट्टाधीश राष्ट्र गौरव वात्सल्य वारिधि आचार्य वर्द्धमान सागर जी महाराज ने उन्हें सोमवार को मुनि दीक्षा ग्रहण कराई। जैन मुनि दीक्षा कार्यक्रम राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित किशनगढ़ नगरी में आयोजित हुआ। देशभर से आए हजारों श्रद्धालु मुनि दीक्षा के साक्षी बने। आचार्यश्री ने दीक्षा संस्कार के बाद पंडित आदेश्वर पचौरी का मुनि मुमुक्षु सागर नाम रखा।
बनाया विरक्ति का मानस
श्रीफल जैन न्यूज के अशोक कुमार जेतावत ने बताया कि पंडित आदेश्वर पचौरी का जन्म राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में धरियावद के छोटे से गांव खूंता में हुआ था। उनके पिता का नाम स्वर्गीय जड़ावचंद और माता का स्वर्गीय सागर देवी पचौरी है। 67 वर्षीय आदेश्वर पचौरी ने धरियावद को अपनी कर्मभूमि बनाया और गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए व्यापार किया। इस दौरान वे जैन धर्म के संस्कारों को अपने जीवन में धारण करते रहे। धीरे-धीरे उन्होंने सांसारिक कार्यों से विरक्ति का मानस बनाया और खुद को उदासीन करते हुए मोक्ष मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
अनुमोदन किया स्वीकर
पंडित आदेश्वर पचौरी आचार्य श्री वर्द्धमान सागर जी महाराज के चरणों में पहुंचे और जैनेश्वरी दीक्षा की इच्छा जाहिर करते हुए श्रीफल भेंट किया। आचार्य ने उनका अनुमोदन स्वीकर कर लिया और 13 फरवरी को वह शुभ घड़ी आई जब दीक्षार्थी का मंगल स्नान काते हुए उन्हें जैन मुनि दीक्षा दी गई। इससे पहले किशनगढ़ के क्रिस्टल पार्क के सामने स्थित सूरज देवी पाटनी सभागार में उन्हें बैंड-बाजों के जुलूस के साथ ले जाया गया।
केशलोंचन संपन्न
पंडित आदेश्वर पचौरी ने मुनि दीक्षा की पहली सीढ़ी केशलोंचन को सफलतापूर्वक संपन्न किया। इसके बाद दीक्षार्थी ने गुरु की आज्ञा से शरीर के सभी वस्त्र और आभूषणों का त्याग कर दिया और दिगंबर वेष धारण किया। फिर आचार्यश्री ने सिद्ध भक्ति पढ़ते हुए दीक्षार्थी के सिर पर गंधोदक से शुद्धि की और श्रीकार लेखन करके मंत्रोच्चार पूर्वक दीक्षा संस्कार संपन्न कराया। उन्होंने दिगंबर मुनि के 28 मूलगुणों की स्थापना की और दीक्षार्थी को मुमुक्षु सागर महाराज नया नाम दिया।
इन्हें मिला सौभाग्य
इसके बाद पूरा सभागार आचार्यश्री और नवदीक्षित मुनिराज के जय-जयकारों से गूंज उठा। नवदीक्षित मुनि के माता-पिता बनने का सौभाग्य उनके गृहस्थावस्था के पुत्र-पुत्रवधू नीलेश एवं उषा देवी पचौरी ने प्राप्त किया। शास्त्र भेंट का सौभाग्य अशोक पाटनी (आरके मार्बल ग्रुप) को, कमंडल भेंट का विजय कुमार, हितेश, शीतल डागरिया परिवार (उदयपुर) पिच्छिका भेंट का गृहस्थ पुत्र-पुत्रवधू हेमंत एवं दीपिका पचौरी और जाप्यमाला भेंट करने का सौभाग्य गृहस्थावस्था के भाई ईश्वर, नरेंद्र, राजेश और महावीर पचौरी परिवार, धरियावद को मिला।













Add Comment