दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 122वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“कबीर आप ठगाइए, और न ठगिए कोय।
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय॥”
कबीर कहते हैं कि दूसरों को धोखा देने से केवल दुःख ही प्राप्त होता है, क्योंकि ऐसा व्यक्ति सदैव भय, अपराधबोध और सामाजिक अपमान की आशंका में जीता है। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति स्वयं को दूसरों के लिए समर्पित कर देता है — भले ही वह “ठगा जाना” प्रतीत हो — तो उसे अंततः मानसिक शांति और आत्म-संतोष की प्राप्ति होती है।
“परहित सरिस धर्म नहीं भाई” — अर्थात, दूसरों के हित में अपना नुकसान सहना भी सबसे बड़ा धर्म है।
अपने अहंकार, स्वार्थ, और अधिकारों का त्याग करके ईश्वर की भक्ति में लग जाना और दूसरों की सेवा करना ही सच्चा धर्म है।
यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति दूसरों को ठगने के बजाय सेवा और त्याग की भावना से कार्य करे, तो सामाजिक समरसता और सौहार्द्र बना रहेगा। समाज धोखे से नहीं, बल्कि परस्पर समर्पण और सहयोग से मजबूत बनता है।
‘स्वयं को ठगाना’ का गहरा अर्थ है — अपने अहम (ईगो), वासना, मोह, क्रोध, लोभ आदि का त्याग करना। जब व्यक्ति इन सांसारिक बंधनों से मुक्त होता है, तभी उसे आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
दूसरों को धोखा देने वाला व्यक्ति अंततः भीतर से खोखला रह जाता है।
कबीर इस दोहे के माध्यम से एक अत्यंत गहन जीवन-दर्शन प्रस्तुत करते हैं:
धोखा देना नहीं, बल्कि स्वयं को त्यागकर सेवा, सहनशीलता और विनम्रता के मार्ग पर चलना ही सच्चा सुख देता है।













Add Comment