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महरौनी में दशलक्षण महापर्व का भव्य समापन : दस धर्मों की साधना और भक्ति से गूंजा नगर


महरौनी के श्री अजित नाथ बड़ा जैन मंदिर में भाद्रपद शुक्ल पंचमी से शुरू हुआ दशलक्षण महापर्व आज ब्रह्मचर्य धर्म के साथ सम्पन्न हुआ। दस दिनों तक नगर में भक्ति, संयम और धर्म-भावना का अद्भुत उत्साह देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने दसों धर्मों की साधना में भाग लिया और जीवन में इन्हें अपनाने का संकल्प लिया। पढ़िए राजीव सिंघई की पूरी रिपोर्ट…


महरौनी। श्री अजित नाथ बड़ा जैन मंदिर में भाद्रपद शुक्ल पंचमी से आरंभ हुआ दशलक्षण महापर्व आज ब्रह्मचर्य धर्म के साथ श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में सम्पन्न हुआ। दस दिनों तक नगर में भक्ति, संयम और धर्म-भावना का अद्भुत उत्साह देखने को मिला। मंदिर प्रांगणों में प्रतिदिन प्रातःकालीन पूजन, सामूहिक प्रतिक्रमण और प्रवचन का आयोजन हुआ, जिससे श्रद्धालुओं ने आत्मा की शुद्धि और मोक्ष के पथ का अनुभव किया।

समापन अवसर पर मुनिश्री गुरूदत्तसागर जी महाराज एवं मुनिश्री मेघदत्तसागर जी महाराज ने प्रवचन देते हुए कहा कि दशलक्षण महापर्व केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मा की जागृति और साधना का माध्यम है। उन्होंने बताया कि दसों धर्म आपस में जुड़े हुए हैं और क्रमिक रूप से आत्मा को पवित्र बनाते हैं।

दस धर्मों में क्षमा धर्म वैर और द्वेष को मिटाकर मन में शांति और सौहार्द की नींव रखता है। मार्दव धर्म अहंकार को गलाकर विनम्रता और नम्रता का संदेश देता है। आर्जव धर्म जीवन में सीधापन और सच्चाई स्थापित कर आत्मा को निर्मल बनाता है। शौच धर्म बाहरी और अंतरंग पवित्रता से मन और शरीर दोनों को शुद्ध करता है। सत्य धर्म वाणी और व्यवहार में सच्चाई का पालन कर जीवन को आधार प्रदान करता है। संयम धर्म इंद्रियों पर नियंत्रण और इच्छाओं का संयम कर आत्मबल और मानसिक स्थिरता देता है। तप धर्म कठोर साधना और आत्मसंयम से कर्मों का क्षय कर आत्मा को शक्तिशाली बनाता है। त्याग धर्म लोभ और आसक्ति को त्याग कर उदारता और दान की भावना जगाता है। आकिंचन्य धर्म वस्तुओं के मोह और लालसा से मुक्ति दिलाकर आत्मा को स्वतंत्र बनाता है। और अंततः ब्रह्मचर्य धर्म इंद्रियों और मन की विजय कर आत्मा को परम पवित्रता और मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर करता है।

जीवन में धर्मों को अपनाने का संकल्प 

मुनिश्रियों ने कहा कि ये सभी धर्म अलग-अलग प्रतीत होते हैं, लेकिन वास्तव में यह एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और मिलकर आत्मा को पूर्णता की ओर ले जाते हैं। भक्तिभाव और प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं ने जीवन में इन धर्मों को अपनाने का संकल्प लिया।

समापन अवसर पर क्षमाबाणी मनाया गया, मंगलाचरण गूंजा और सामूहिक संकल्प लिया गया कि अहिंसा, संयम, सत्य और सदाचार को जीवन में अपनाया जाएगा। नगर के वरिष्ठजनों और कार्यकर्ताओं ने आयोजन की सफलता पर हर्ष व्यक्त किया। सांध्यकालीन वेला में जलविहार शोभायात्रा निकाली गयी, जिसका समापन बड़ा जैन मंदिर में हुआ। यहां भगवान जिनेन्द्र का अभिषेक एवं शांति धारा हुई। पांडुशिला पर भगवान जिनेन्द्र की स्थापना करने का सौभाग्य ऋषभ कठरया, कोमल जैन, राजेश पाय और नीलेश सराफ को प्राप्त हुआ। शांतिधारा करने का सौभाग्य सुनील गढोली, अंकित चौधरी और राहुल जैन सागर को प्राप्त हुआ। चमर ढुलाने का सौभाग्य राहुल जैन आनंद सराफ और महाआरती का सौभाग्य अंगूरी लौडुआ और अशोक पाय को प्राप्त हुआ।

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