सनावद में दिगंबर जैन समाज ने दसलक्षण पर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की आराधना की। मुनि श्री साध्य सागर जी और मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी ने प्रवचनों में बताया कि दान हमेशा स्व और पर के उपकार के लिए किया जाता है। समाजजनों ने चार प्रकार के दान देकर पुण्य अर्जित किया और प्रतियोगिताओं में भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
सनावद में दिगंबर जैन समाज ने पर्युषण पर्व के अंतर्गत दसलक्षण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म का दिन बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया। इस अवसर पर श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर और संत निलय में पंचामृत अभिषेक एवं शांतिधारा का आयोजन हुआ। मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि सच्चा त्याग तभी है जब मनुष्य मोह, राग और द्वेष को छोड़ देता है। उन्होंने दान को स्व और परोपकार दोनों के लिए आवश्यक बताया और कहा कि आहार दान, औषध दान, ज्ञान दान और अभय दान के द्वारा जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है।
वांछा रहित दान ही कर्मक्षय का कारण बनता
इसी क्रम में मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी महाराज ने कहा कि सुपात्र को दिया गया दान मुक्ति का कारण है जबकि कुपात्र को दिया गया दान बंधन को बढ़ाने वाला होता है। वांछा रहित दान ही कर्मक्षय का कारण बनता है और उत्तम त्याग धर्म भव बंधन से मुक्ति दिलाता है।पर्व के दौरान समाजजनों ने चारों प्रकार के दान देकर पुण्य अर्जित किया। साथ ही प्रतिदिन ज्ञानवर्धक प्रतियोगिताओं का आयोजन भी हो रहा है, जिनमें महिला महासमिति, अंतर्राष्ट्रीय पोरवाड़ मंच और जैन कॉलोनी ग्रुप जैसे मंडलों की सक्रिय भागीदारी रही। रात्री में छोटे बच्चों की धार्मिक वेशभूषा प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जिसमें नन्हे प्रतिभागियों ने आकर्षक प्रस्तुतियां दीं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे और दान व त्याग की भावना के महत्व को आत्मसात किया।













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