मैत्री भाव के साथ आपस में मिल जुलकर महावीर भगवान द्वारा दी गई वाणी को साकार कर विश्वबंधुत्व की कड़ी को मजबूत बनायें। पढ़िए महावीर जयंती पर सुमति प्रकाश जैन (प्राचार्य) का यह विशेष आलेख…
नैनागिरि। चौबीसवें तीर्थकर एवं वर्तमान शासन नायक की जयंती वर्तमान नायक श्री 1008 महावीर स्वामी की जन्म जयंती हर्षोल्लास के साथ मनायेंगे। महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के कुंडलपुर में माता त्रिशला एवं पिता राजा सिद्धार्थ के यहां हुआ था। भगवान का जन्म होते ही सर्प-नेवला-गाय- सिंह जैसे वन्य प्राणी आपस में क्रीड़ा करने लगे थे तथा नारकीय जीव भी कुछ क्षण के लिए सुख की अनुभूति करने लगे थे। भगवान महावीर स्वामी की अलग-अलग विशेषताओं के कारण उन्हें वीर, अतिवीर, सन्मति, वर्धमान नामों से जाना जाता है। बाल्यावस्था में मित्रों के साथ खेल रहे थे, उसी समय एक देव ने उन्हें डराने के लिए सर्प का रूप धारण किया, लेकिन बालक महावीर ने निडरता के साथ सर्प को उठाकर फेंक दिया। यह देख सभी आश्चर्यचकित होकर रह गए और इन्हें उसी समय से महावीर नाम से संबोधित किया। तीस वर्ष की अल्प आयु में ही भगवान महावीर को वैराग्य उत्पन्न हुआ और वन की ओर विहार कर गये। इस दौरान जगह-जगह जाकर जीव दया का पाठ पढ़ाकर विश्व में अहिंसा का बिगुल बजाकर सुख और शांति का मार्ग प्रशस्त किया। 70 वर्ष की आयु में महान तप के फलस्वरूप उन्हें केवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा अनन्त सुखी रूपी रत्न प्राप्त किया। ऐसे महापुरुष की जन्म जयंती मनाना तभी सार्थक है, जब हम हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह को छोड़कर पंच महाव्रत तथा जीव दया जैसे मानवता रूपी गुणों को धारण कर मैत्री भाव के साथ देश को हिंसा मुक्त बनायें। महावीर स्वामी विश्व के सभी जीवों के रक्षार्थ अहिंसा का डंका बजाया था, उसका प्रभाव वैज्ञानिक जगत में दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने अपने सिद्धांत में कहा था कि नभ, थल, जल, अग्नि, वनस्पति सभी में जीवों का वास होता है। वे सभी सुख-दुःख का अनुभव करते हैं। जिस बात को महावीर स्वामी ने कई वर्षों पूर्व सिद्ध कर दिया था, उसी तथ्य को भारत के महान वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बसु ने पुनः सिद्ध किया कि पेड़-पौधों में भी हमारी तरह प्राणी है, क्योंकि चैतन्य जीव में ही सुख-दुःख का अनुभव होता है, जड़ पदार्थ में नहीं। सभी से निवेदन है कि आज इस महान पर्व पर बैर भाव को त्याग करें। मैत्री भाव के साथ आपस में मिल जुलकर महावीर भगवान द्वारा दी गई वाणी को साकार कर विश्वबंधुत्व की कड़ी को मजबूत बनायें। दो और दो मिलकर चार होते हैं। 4 अप्रैल को यह दिवस हमें जोड़ने की संक्रिया पर ध्यान आकर्षित कर रहा है। अतः 2622वीं जयंती पर मेरी भावना की एक पंक्ति ध्यान में रखकर मैत्री भाव बनाकर सहयोग की भावना जागृत करें…
‘मैत्री भाव जगत में मेरा,
सब जीवों से नित्य रहे ‘
प्रस्तुति -राजेश रागी













Add Comment