मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने क्षमावाणी पर्व के अवसर पर अपने प्रवचन में कहा, “शराब, सिगरेट या गुटखा खाना पाप नहीं है, परंतु मां को निपूती करना सबसे बड़ा पाप है।” उन्होंने कहा कि मां इसलिए महान होती है क्योंकि वह झूठ बोलना जानती है। झूठ दो प्रकार के होते हैं – एक, दूसरे के विनाश के लिए बोला जाता है, जो पाप कहलाता है, और दूसरा, उत्थान और हित के लिए बोला जाता है, जो पुण्य और धर्म होता है। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…
सागर। मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने क्षमावाणी पर्व के अवसर पर अपने प्रवचन में कहा, “मां इसलिए महान होती है क्योंकि वह झूठ बोलना जानती है, झूठ दो प्रकार के होते हैं- एक दूसरे के विनाश के लिए, दूसरे के गुणों को छुपाने के लिए, दूसरे की अवमानना के लिए झूठ बोला जाता है, वह झूठ पाप कहलाता है। एक झूठ विकास के लिए, उत्थान के लिए, हित के लिए बोला जाता है, वह झूठ भी पुण्य है और धर्म कहलाता है। भक्ति वह नहीं है जो सत्य बोलता है, भक्ति वह है जो ऐसा झूठ बोलती है, जो सत्य से भी बड़ा होता है। उन्होंने कहा कि किसी को दुआ देना, भक्ति करना है, प्रशंसा करना है, यदि तुम सही में गुणवान के प्रति अनुरागी हो तो उसके पास जितने गुण हैं उतना ही बखान मत करो, उसमें तुम जितने भी बड़ा-चढ़ाकर कह सको, कहना चाहिए।
अपने आराध्य में, अपने इष्ट में, अपने प्रिय में थोड़ा सा भी गुण हो वहाँ सत्य मत बोलना। उसको जितने ज्यादा ऊंचाई पर तुम मान सको, जबकि वो है नीचे। यदि जितना वो है उतना ही बोलना तो तुम्हारी भक्ति क्या हुई, तुमने क्या दिया, तुम्हे पुण्यबन्ध क्यों होगा। मुनि को मुनि मानना यह भक्ति के अंतर्गत नही आएगा, ये सत्य की जानकारी है। इससे निर्जरा तो होगी लेकिन वो पुण्यबन्ध नहीं होगा, जो हमें चाहिए।
मां-बाप को नीचा न देखना पड़े
मंदिर कितने ही पवित्र रखना लेकिन आने वाले रास्ते यदि गंदे है तो वह मंदिर भी जरा देर पवित्र नहीं रह पाएगा। भगवान कितना भी निर्मल क्यों न हो लेकिन भक्त यदि गंदे हैं तो भगवान कोई कार्यकारी नही होंगे। भगवान जो नहीं है, वह अपने बना दिया तो वहीं से आपको सातिशय पुण्य का बंध होता है। तुम अपने गुरु में क्या भावी पर्याय देख रहे हो, चलते फिरते सिद्ध समान, यहाँ से भक्ति शुरू होती है।
भक्त जितना ऊँचा उठाएगा, उतना ही ऊंचा तुम्हें पुण्यबंध होगा और आराध्य अपने आप को जितना नीचे मानेगा, उतनी ही उसकी साधना पवित्र होगी। तुम झुको तो झुक जाना लेकिन तुम्हारे कारण भक्त को शर्मिंदा न होना पड़े। तुमने क्या किया उसका महत्व नहीं है, तुम्हारे कारण से कितने लोगों को नीचा देखना पड़ा, सवाल उसका है। बेटों को जो करना है करो, कोई पाबंदी नहीं है बस तुम्हारे कारण से कहीं माँ-बाप को नीचा न देखना पड़े, ये है सबसे बड़ा पाप।
पाप कोई पाप नही होता लेकिन तुमने ऐसा पाप किया जिसमें तुम्हारी जाति को, राष्ट्र को नीचा देखना पड़ा, जाओ अब तुम्हारे लिए हजारों हजारों भवों तक आर्यखण्ड नही मिलेगा। कुकर्म तुमने किया था और बदनाम देश हुआ था। जो करना है करो, बस तुम्हारे कारण कुल में कलंक न लग जाए, ऐसा कोई पाप मत करना जिससे पूर्वजों की इज्जत धूल में मिल जाए।













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