समाचार

पूर्ण ज्ञान तथा कर्म सिद्धांत का ज्ञान होना आवश्यक: धर्मसभा में मुनिश्री के प्रवचनों का लाभ ले रहे हैं धर्मप्रेमी श्रद्धालु 


संत अपनी इच्छा से शरीर छोड़ते हैं, क्योंकि वे शरीर के बंधन से मुक्त होते हैं । यह उदगार मुनि श्री संभव सागरजी महाराज ने भगवती आराधना ग्रंथ का स्वाध्याय कराते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शरीर मोक्ष प्राप्ति का एक मात्र साधन हैं। विदिशा से पढ़िए, यह खबर…


विदिशा। संत अपनी इच्छा से शरीर छोड़ते हैं, क्योंकि वे शरीर के बंधन से मुक्त होते हैं । यह उदगार मुनि श्री संभव सागरजी महाराज ने भगवती आराधना ग्रंथ का स्वाध्याय कराते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि शरीर मोक्ष प्राप्ति का एक मात्र साधन हैं। इसलिए साधकों को आत्मकल्याण और मोक्ष मार्ग पर चलने के लिये आवश्यक सैद्धांतिक ज्ञान और व्यवहारिक मार्ग दर्शन तथा मृत्यु के अंतिम समय में किस प्रकार की साधना तथा कैसा आचरण होना चाहिए। इस बात का वर्णन भगवती आराधना में किया गया है। एक क्षपकराज को सावधानी पूर्वक आलस्य और हिंसा का त्याग करते हुए जाग्रत और सावधान रहकर समितियों एवं गुप्तिओं का पूर्णतया पालन करना चाहिये इसके लिये एक क्षपक को तत्वों का पूर्ण ज्ञान तथा कर्म सिद्धांत का ज्ञान होना आवश्यक है। जिससे वह संयम,विनय तथा आवश्यक नियमों के साथ मन और आत्मा के संतुलन के साथ शांति से मृत्यु प्राप्त कर सके। तभी उसकी समाधि सल्लेखना पूर्ण होगी है।

मिथ्यात्व और सम्यकत्व की सरल शब्दों में व्याख्या की 

मुनि श्री ने कहा कि क्षपक यानि जिसकी सल्लेखना होंने जा रही है वह अपने कर्मों का प्रतिक्रमण,कायोत्सर्ग, विनय और स्वाध्याय तथा अनुप्रेक्षा में 12 भावनाओं में युक्त होता हुआ अनुशासन का पालन करता है,इस प्रकार निर्यापकाचार्य उस क्षपक को श्रुत ज्ञान के अनुसार संसार से भय और बैराग्य उत्पन्न करने वाली शिक्षा उसके कानों में देते है। मुनि श्री ने कहा कि सल्लेखना शुरु होंने के पहले निर्यापक क्षपक को बार बार याद दिलाता है कि कहीं आप मिथ्यात्व में तो नहीं चले गये? उन्होंने मिथ्यात्व और सम्यकत्व की सरल शब्दों में व्याख्या बताते हुये कहा कि एक बार एक अजेन मित्र आचार्य शांतिसागर महाराज के पास बैठे थे। उन्होंने मिथ्यात्व और सम्यकत्व की परिभाषा पूंछी तो गुरुदेव ने दो लाईन में इसका उत्तर दे दिया आत्मा में डूबने का नाम सम्यकत्व और आत्मा से बाहर आ गये तो मिथ्यात्व शुरू हो गया।

एक बार सम्यक् दर्शन हो गया सो हो गया 

मुनि श्री ने कहा कि आध्यात्म तो यही कहता है कि जो आत्मा से बाहर आ गया वह सभी मिथ्यादृष्टि है। मुनि श्री ने कहा कि जैन दर्शन कहता है कि यह जरुरी नहीं कि एक बार सम्यक् दर्शन हो गया सो हो गया ऐसा कुछ भी नहीं है। यहां तो आप मिथ्यात्व में गये नहीं कि जीरो पर आऊट हो जाओगे सावधानी हटी और दुर्घटना घटी। इसलिये क्षपक एक बार फिर से देख लेता है कि उसको सल्लेखना देने वाले पात्र योग्य है कि नहीं, जिससे वह निःशल्य होकर अपनी अंतिम सल्लेखना समाधि की ओर अग्रसर हो सके।

अष्टदृव्यों के साथ संगीतमय पूजन 

अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि मुनि श्री दोपहर में तीन बजे से चार बजे तक भगवती आराधना का स्वाध्याय करा रहे है। जिसमें मुनि श्री निस्सीम सागर जी, मुनि श्री संस्कार सागर जी महाराज के साथ क्षुल्लक जी एवं ब्रहमचारी के साथ सभी तत्व जिज्ञासु भी भाग लेकर अपनी जिज्ञासा का समाधान भी पा रहे हैं। प्रतिदिन प्रातः 8. 45 से आचार्य विद्यासागरजी महाराज एवं वर्तमान आचार्य समयसागर महाराज की अष्टदृव्यों के साथ संगीतमय पूजन किया जा रहा है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shree Phal News

About the author

Shree Phal News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page