न्यूज़ सैजन्य- राजेश जैन दद्दू
इंदौर। तीर्थंकर की पीयूष देशना हम सभी जीवों के लिए कल्याण का साधन है, लेकिन तीर्थंकर तो अब हैं नहीं, उनकी वाणी अंश रूप में है। यदि उसका श्रवण कर आपका चित्त अभी भी नहीं चेता तो आपका कल्याण होने वाला नहीं है। जैसे एक मां भोजन बनाते समय जाग्रत रहती है, उसी प्रकार जीव को भी संसार में आने के बाद प्रतिपल जाग्रत रहना चाहिए। ऐसा करना कठिन जरूर है लेकिन उसका अभ्यास साध्य है।
यह उद्गार रविवार को मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने समोसरण मंदिर कंचन बाग में प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मथानी दो रस्सी के माध्यम से घूमती है, वैसे ही जीव भी राग- द्वेष की रस्सी से घूम रहा है। आज व्यक्ति चित्र के राग के पीछे चरित्र को खो रहा है। अगर राग करना ही है तो पंच परमेष्ठी से प्रशस्त राग करो और द्वेष करना है तो सप्त व्यसन से करो। लेकिन जिन शब्दों से, वस्तुओं से, क्रियाओं से कोई प्रयोजन नहीं है उनसे राग और प्रयोजन रख रहे हो। राग में दुख है, सुख नहीं है। सुख तो विरक्ति में ही है।
इस अवसर पर पंडित श्री रतन लाल शास्त्री एवं श्री आजाद जैन ने भी विचार व्यक्त किए।सभा का संचालन श्री अजीत जैन ने किया।













