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अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज का धर्म प्रभावना रथ के पांचवे पड़ाव का पांचवा दिन : दृष्टि बदलें, सृष्टि अपने आप बदल जाएगी- मुनि पूज्य सागर


 अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ का पांचवां पड़ाव श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन मंदिर, वैभव नगर में चल रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 12 दिवसीय वृहद भक्तामर महामंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब दृष्टि बदलती है, तो सृष्टि अपने आप बदल जाती है। संसार में कोई भी कुछ भी कहे या करें, अपनी दृष्टि को मत बदलना। अपनी दृष्टि में हमेशा प्रेम, दया, वात्सल्य और दूसरों के सहयोग करने के भाव बनाए रखना। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट….


इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ का पांचवां पड़ाव श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन मंदिर, वैभव नगर में चल रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 12 दिवसीय वृहद भक्तामर महामंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है।

विधान के पांचवे दिन, मुख्य पुण्यार्जक सोहनलाल, मुकेश, राकेश, शैलेंद्र सरावगी परिवार और 12 दिवसीय सौधर्म इन्द्र संजय सीमा जैन ने भक्तामर काव्य के 17, 18, 19 और 20 काव्य की आराधना करते हुए कुल 224 अर्घ्य समर्पित किए। अब तक इस आयोजन में कुल 1120 अर्घ्य समर्पित किए जा चुके हैं।

इस विशेष अवसर पर शान्तिधारा का लाभ संजय सीमा जैन, सोहनलाल जैन, राकेश मुकेश, शैलेंद्र, आलेख सरावगी, प्रकाशचंद, राजकुमार मदावत, दीपक, सपना, संदीप, अर्पिता, प्रियांशी, अक्षत, मितांशी, क्रिशा, प्राहिल, आशी कोरिया, आकाश, सारिका, अनीश कोरिया, प्रकाश राहुल सरावगी को प्राप्त हुआ।

दीप प्रज्वलन, चित्रानावरण और मुनि श्री के पाद प्रक्षालन का इंद्रकुमार, कमला, मुकेश जैन को मिला। शास्त्र भेंट का लाभ सूरज जैन, अनिता जैन परिवार को मिला।

मन एक उपजाऊ भूमि

इस अवसर पर मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जब दृष्टि बदलती है, तो सृष्टि अपने आप बदल जाती है। संसार में कोई भी कुछ भी कहे या करें, अपनी दृष्टि को मत बदलना।

अपनी दृष्टि में हमेशा प्रेम, दया, वात्सल्य और दूसरों के सहयोग करने के भाव बनाए रखना। यदि आप अपनी दृष्टि को अच्छी बनाए रखेंगे, तो कर्म नहीं बंधेंगे। लेकिन यदि आपकी दृष्टि बुरी रही, तो कर्म का बंधन रोकना संभव नहीं होगा।

मुनि श्री ने उदाहरण दिया कि जैसे मारीची ने 363 मिथ्या मत चलाईं, जिसमें हम आज भी घूम रहे हैं। मारीची शेर की पर्याय में दृष्टि बदलकर महावीर बने, वहीं हम आज भी चक्रव्यूह में उलझे हुए हैं।

राम ने अपनी दृष्टि में वैभव और राजपाठ को नहीं रखा, बल्कि पिता के वचनों का पालन करते हुए वनवास को स्वीकार किया। उन्होंने दो वाक्य में इसे बहुत सुंदर ढंग से समझाया कि मन एक उपजाऊ भूमि है, जहां हर समय एक नया विचार, एक नई भावना उपजती है।

यदि आपने सकारात्मक भाव और विचार उपजाए हैं, तो यह भूमि हमेशा हरी-भरी रहेगी। लेकिन यदि आपने कषाय और घृणा उपजाई, तो यह भूमि बंजर बन जाएगी।

जैसे धन की दृष्टि को आप भविष्य की ओर रखते हैं, वैसे ही व्यवहार की दृष्टि को भी भविष्य की ओर रखना चाहिए।

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