प्राकृत भाषा, भारत की एक प्राचीन भाषा, से अनेक अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों का उद्भव हुआ है। इस भाषा में हजारों जैन आगम और जैन साहित्य रचित हैं, जो लगभग 2500 वर्ष से भी पुराने हैं। प्राकृत भाषा के विद्वानों की पिछले कई दशकों से यह मांग रही है कि इसे शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए, ताकि इसका संरक्षण और संवर्धन किया जा सके। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…
इंदौर। प्राकृत भाषा, भारत की एक प्राचीन भाषा, से अनेक अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों का उद्भव हुआ है। इस भाषा में हजारों जैन आगम और जैन साहित्य रचित हैं, जो लगभग 2500 वर्ष से भी पुराने हैं। प्राकृत भाषा के विद्वानों की पिछले कई दशकों से यह मांग रही है कि इसे शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए, ताकि इसका संरक्षण और संवर्धन किया जा सके। कई विद्वानों ने सरकार से इस अनुरोध को स्वीकारते हुए, भारत सरकार ने 3 अक्टूबर 2024 को प्राकृत भाषा को शास्त्रीय दर्जा प्रदान करने की घोषणा की। इसके साथ ही पाली, असमिया, मराठी और बंगला भाषाओं को भी शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया है।
प्राकृत भाषा में प्रकाशित होने वाली पहली पत्रिका “पागद-भासा” के संपादक जैन रत्न प्रो. अनेकांत कुमार जैन ने इस अवसर पर प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर आभार और धन्यवाद ज्ञापित किया है। यह उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने भारतीय भाषाओं के संरक्षण की मुहिम शुरू की है। नई शिक्षा नीति में भी भारतीय भाषाओं को प्रमुखता दी गई है। इंदौर दिगंबर जैन समाज के वरिष्ठ लेखक और पत्रकार डॉ. जैनेन्द्र जैन, महावीर ट्रस्ट के अध्यक्ष अमित कासलीवाल, हंसमुख गांधी, टीके वेद, डॉ. अनुपम जैन सहित संपूर्ण जैन समाज ने केंद्र सरकार के इस ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत करते हुए आभार प्रकट किया है।













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