आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परंपरा के तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज का 38 वां समाधि वर्ष मनाया गया। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज संघ सानिध्य उनका गुणानुवाद किया गया। उन्होंने उनके गृहस्थ जीवन के कई प्रसंगों का वाचन किया। जिसे सुनकर श्रद्धालु भाव विभोर हो गए। मंदसौर से पढ़िए यह खबर…
मंदसौर। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की परंपरा के तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज का 38 वां समाधि वर्ष आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज संघ सानिध्य में 22 अप्रैल वैशाख कृष्ण नवमी को उत्साह और भक्ति पूर्वक मनाया गया। इस अवसर पर आचार्य धर्मसागर विधान मंडल के पूजन में चढ़ाए जाने अर्ध्य का वाचन मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने किया। विनयांजलि सभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि आचार्य श्री धर्मसागर जी गृहस्थ अवस्था से व्रती और निस्पृही रहे। इंदौर की कपड़ा मिल में कपड़ा निर्माण की हिंसा के कारण नौकरी छोड़ दी। स्वयं ने व्यापार प्रारंभ किया, केवल एक रुपए का मुनाफा होने पर वापस घर आकर धर्म ध्यान में लीन हो जाते।
प्रमुख आचार्य होने से दिगंबर धर्म के सिद्धांतों का संरक्षण किया
राजेश पंचोलिया ने बताया कि आचार्य श्री ने अपने दीक्षा गुरु के सानिध्य को स्मरण कर भाव विभोर होकर बताया कि सन 1974 में भगवान महावीर स्वामी के 2500 वें निर्वाण महोत्सव में प्रमुख आचार्य होने से दिगंबर धर्म के सिद्धांतों का संरक्षण किया। आप माला फेरने के लिए कंकर या चांवल के दानों से माला फेरते थे। स्वयं के अभिवंदन ग्रंथ को हाथ में नहीं लिया। अघोषित संल्लेखना समाधि में क्रम से आहार सामग्री का त्याग करते रहे। आपने 76 भव्य प्राणियों को संयम दीक्षा दी। जिसमे हमें भी फरवरी सन 1969 में मुनि दीक्षा दी। अन्य साधुओं ने अपनी विनयांजलि प्रस्तुत कर गुणानुवाद किया। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज श्री पार्श्वनाथ जिनालय बही पार्श्वनाथ में संघ सहित विराजित हैं। प्रातः काल श्रीजी का पंचामृत अभिषेक हुआ। इसके पूर्व आर्यिका श्री शुभमति, मुनि श्री हितेंद्रसागर जी ने आचार्य श्री धर्म सागर जी की गृहस्थ अवस्था के अनेक प्रसंग बताए। जिन्हें सुनकर सब द्रवित हुए। दोपहर को आचार्य धर्मसागर विधान के पूजन श्रद्धालुओं ने किए।













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