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भगवान श्री आदिनाथ एवं श्री श्रेयांशनाथ भगवान के कल्याणक दिवस मनाए : अक्षय वट जिसके नीचे ऋषभ देव को केवल ज्ञान हुआ, उसका संबंध श्रीराम और सीता से भी 


आदि परमेश्वर, प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री आदिनाथ स्वामी का ज्ञान कल्याणक एवं जैन धर्म के ग्यारहवे तीर्थंकर श्री श्रेयांश नाथ भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक दिवस श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर समर्थ सिटी में समाजजनों द्वारा उत्साह के साथ मनाया गया। इंदौर से पढ़िए, ओम पाटोदी की खबर…


इंदौर। आदि परमेश्वर, प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री आदिनाथ स्वामी का ज्ञान कल्याणक एवं जैन धर्म के ग्यारहवे तीर्थंकर श्री श्रेयांश नाथ भगवान का जन्म एवं तप कल्याणक दिवस श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर समर्थ सिटी में समाजजनों द्वारा उत्साह के साथ मनाया गया। प्रातः जिनेन्द्र भगवान के अभिषेक, पूजन, शांति धारा की गई। जिसका सौभाग्य मुन्नालाल जैन, अखिलेश प्राची जैन, सुभाष अनिता श्रेय जैन परिवार, धवल, चर्चित, ओम पाटोदी परिवार, राहुल योगेंद्र राजकुमारी परिवार ने प्राप्त किया। इस कलिकाल में प्रथम ज्ञान की ज्योति को प्रज्वलित करने वाले इक्ष्वाकु वंश में जन्मे आदि परमेश्वर, प्रथम तीर्थंकर भगवान श्री आदिनाथ स्वामी ने जिस वृक्ष के नीचे बैठकर 1 हजार वर्ष तपस्या करके केवल ज्ञान की प्राप्ति की। आगे चलकर उसका संबंध उसी वंश श्रीराम के वनवास से भी रहा। वहीं सीता सती की भी कहानी इससे जुड़ी हुई है। यह दास्तान है प्रयागराज में गंगा-जमुना संगम पर स्थित किले में सदियों से लहलहा रहे उस वटवृक्ष की, जो भारतीय संस्कृति की अपूर्व आस्था का केंद्र है और जिसे अक्षय वट वृक्ष के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में यहां हिन्दू मंदिर के साथ ही भगवान ऋषभदेव आदिनाथ जी के प्राचीन चरण चिन्ह के साथ ही तीर्थंकर प्रतिमाएं विराजमान हैं जो अतिप्राचीन है।

हस्ती मिटाने वाले के हौसले पस्त 

आस्था का यह अतिशय इतना अद्भुत है कि इस वृक्ष को मुगलकाल में कई बार नष्ट करने की असफल कोशिश की गई परन्तु, यह वृक्ष पुनः पुनः जीवित हो उठा। इसका उल्लेख जैन और वैदिक ग्रंथों में तो बड़े सम्मान के साथ उपलब्ध है। वहीं विदेशी यात्रियों के भारत यात्रा वृतांत में भी मिलता है। फारसी विद्वान अलबरूनी जब 1017 ईस्वी में भारत यात्रा पर आए थे। उन्होंने एवं चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपनी भारत यात्रा संस्मरण में इस वटवृक्ष का उल्लेख किया। अकबर जब 1575 में प्रयाग आया तो इस क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता से प्रभावित होकर 1583-84 में यहां क़िला बनाया। तब इस वटवृक्ष को किले की सीमा में ले लिया था। उस समय इसको कुछ क्षति हुई थी परन्तु, यह ज्यों का त्यों खड़ा रहा। आश्चर्य तो तब होता है, जब यह किला जहांगीर के अधिकार में आया तो उसने अक्षयवट को कटवा दिया और लोहे की मोटी चादर से ढकवा दिया परन्तु, इसकी कपोले पुनः फूट गई। तब उसने इसे जला दिया परन्तु, अति आश्चर्य तो तब हुआ जब राख में से कपोले फूट गई। औरंगजेब ने अपने शासनकाल में भी इसके दर्शन-पूजन पर रोक दी थी। बाजीराव पेशवा ने उसके साथ समझौता किया और जन सामान्य इसके दर्शन कर सके। अंग्रेजों के शासनकाल में पुनः इसके दर्शन पूजन पर रोक लगा दी थी। जो आजादी के बाद तक जारी रही। हाल ही में शासन द्वारा10 जनवरी 2019 इसका जीर्णोद्धार करके जनता के लिए खोला गया।

भारतीय डाक विभाग ने जारी किया है टिकट 

पाटोदी ने बताया कि हाल ही में प्रयागराज कुंभ के अवसर पर भारतीय डाक विभाग द्वारा वर्ष 2025 में तीन डाक टिकट का सेट जारी किया गया था। जिसमें एक डाक टिकट इस अक्षय वट वृक्ष पर भी जारी किया गया। यह डाक टिकट 5 रूपए मूल्यवर्ग का है।

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