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धर्मसभा में दिए प्रवचन : मांसाहारी का फिर भी उद्धार हो सकता है लेकिन कुल कलंकी का कभी उद्धार नहीं हो सकता : मुनि श्री सुधासागर जी महाराज


हम कुछ पाने की इच्छा में जो हमारे पास है, उसको खो बैठते हैं, इसे कहते हैं ओवर कॉन्फिडेंस। जब किसी को भावी पर्याय का कुछ आश्वासन मिल जाए तो वह वर्तमान पर्याय को इतनी बुरी तरह ठुकराता है जैसे ही वर्तमान पर्याय गिरती है, भविष्य गिर जाता है। कितनी ही ऊंचाई पर पहुंच जाना लेकिन जमीन को नहीं भूलना चाहिए। कितने ही हमें भविष्य के आश्वासन मिले लेकिन हमारी जिंदगी तो वर्तमान से ही बनेगी। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…


सागर। हम कुछ पाने की इच्छा में जो हमारे पास है, उसको खो बैठते हैं, इसे कहते हैं ओवर कॉन्फिडेंस। जब किसी को भावी पर्याय का कुछ आश्वासन मिल जाए तो वह वर्तमान पर्याय को इतनी बुरी तरह ठुकराता है जैसे ही वर्तमान पर्याय गिरती है, भविष्य गिर जाता है। कितनी ही ऊंचाई पर पहुंच जाना लेकिन जमीन को नहीं भूलना चाहिए। कितने ही हमें भविष्य के आश्वासन मिले लेकिन हमारी जिंदगी तो वर्तमान से ही बनेगी। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि पुराण काल्पनिक नहीं होगा महाकाव्य काल्पनिक भी हो सकते, इसलिए हमारे यहां प्रथमानुयोग में पुराण आते हैं काव्य नहीं। पुराण पूज्यनीय है, वंदनीय है क्योंकि पुराण में सत्य घटना होती है और वह भी केवली भगवान के द्वारा कथित होती है। काव्य महाकाव्य के विषय में कहा जाता है जहाँ न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि।

तिर्यंच का श्रावक धर्म अलग

उन्होंने कहा कि श्रावक कहते हैं कि हे मुनिवर आप चलते फिरते सिद्ध हैं और मुनि स्वयं प्रतिक्रमण में कहता है मैं पापी, दुष्टि हूं, मायावी हूं तो बताओ सत्य क्या है? तुम यदि सत्य के चक्कर में पड़े तो तुम बर्बाद हो जाओगे, साधु तुम्हारे सत्य के चक्कर में पड़ा तो साधु बर्बाद हो जाएगा। सत्य दो होते है एक सर्वव्यापक होता है, वह सत्य न कल्याणकारी है न अहितकारी। जो व्यक्तिगत सत्य है वही दुर्गति का कारण है और सद्गति का। वही सत्य एक व्यक्ति के लिए नुकसानदायक है तो वही सत्य दूसरे के लिए फायदेमंद। तिर्यंच को बिना छना पानी, बिना प्रोषध के, बिना अतिथि संविभागव्रत के, कोई सचित्त अचित्त का विचार नहीं, ये सब करता हुआ भी तिर्यंच को 16वां स्वर्ग कहा तो क्या हम मनुष्य भी ऐसा ही करें, नहीं। स्पष्ट रुप से कहा तिर्यंच का श्रावक धर्म अलग है, और मनुष्य का श्रावक धर्म अलग है। दोनों के गुणस्थान पंचम है, निर्जरा बराबर है, फल भी बराबर, विशुद्धि भी बराबर है लेकिन दोनों की धार्मिक क्रियाये भिन्न भिन्न है। मनुष्यों में भिन्न एक शुद्र कर रहा है प्रतिमाधारी, एक जैन प्रतिमाधारी। शुद्र 11 प्रतिमा धारण कर सकता है लेकिन मुनि महाराज को आहार नहीं दे सकता, अभिषक पूजन नहीं कर सकता। फल तो दोनों को बराबर मिलेगा लेकिन क्रियारूप धर्म में भेद रहेगा ही रहेगा। यदि हमने भेद नहीं किया तो बहुत मुश्किल है।

कुल की परंपरा समझें

उन्होंने कहा कि शेर का बच्चा मांसाहारी होकर भी इतना बड़ा पापी नहीं है जितना एक मनुष्य, मनुष्य में उच्च और उसमें भी जैन। कभी यह तुलना नही करना कि सबके धर्म-अधर्म एक है, नहीं जैसे तिर्यंचों का कहा, ऐसे ही अजैन और जैन में देखना, एक जैन रात में खा रहा है, शराब पी रहा है तो वह सीधा नरक जाएगा, दूसरा अजैन नरक जाएगा इसकी कोई गारंटी नहीं क्योंकि वो कितने गुण पाल रहा है, रात्रिभोजन कर रहा है एक अजैन, वह अपनी जाति की, अपने पूर्वजों की, अपने गुरु की, अपने शास्त्र की बात मान रहा है क्योंकि ये सब खाते हैं और उसे आज्ञा देते हैं। उसे मात्र अज्ञान का पाप लगेगा, रात्रिभोजन का पाप नहीं लगेगा। शेरनी को मात्र अज्ञानता का पाप लगेगा क्योंकि वह अपनी मां का अनुकरण कर रहा है। मांसाहारी का फिर भी उद्धार हो सकता है लेकिन कुल कलंकी का कभी उद्धार नहीं हो सकता। अब एक जैन व्यक्ति रात्रि में खा रहा है तो वह जात द्रोही है क्योंकि अजैन व्यक्ति ने अपनी जात को कलंकित नही किया, तुमने अपनी जात को कलंकित किया।

तुम्हारी कुल परम्परा से सात पीढ़ी से रात्रि भोजन वर्जित रहा है, ये ऋषभदेव, महावीर का वंश है, तुमने रात में खाकर आज तक जितने पूर्वज हुए है उन्हें कलंकित किया है। जिनसेन स्वामी के अनुसार आठ वर्ष अन्तर्मुहूर्त में, दूसरा 18 वर्ष, तीसरा शादी कि समय इन तीन मौकों पर उसको अपनवंशावली बताना चाहिए। ये सूतक ऐसे ही लगाया गया कि कम से कम तुम्हे सात पीढ़ियों के नाम याद रहे, मेरे सात पीढ़ी पहले कौन थे, कैसे थे, क्या थे, उनकी इज्जत कैसी थी, उनकी दैनंदिनी कैसी थी, उनके आचरण, उनके विचार कैसे थे, उनकी समाज मे इज्जत कैसी थी? और सात पीढ़ी मां की याद करो, तब कहीं जैनकुल की परम्परा याद कर पाओगे। विवाह के पहले बहु से कहा जाता था कि देखो इस घर की महिलाएं, मेरी सासु ऐसी थी क्या तुम इस परम्परा के अनुसार निर्वाह कर सकोगी, ये कुलवधु कहलाती थी। जहां तीन पीढ़ियां एक साथ संस्कारवान होती हैं, उसको बोलते हैं कुल और जाति की कोई सीमा नहीं होती।

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