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संयम-शील के पालन से नर नारायण बन जाता है : आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी ने ब्रह्‌मचर्य व्रत की महिमा बताई


पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी ने धर्मसभा में कहा कि- आत्मा में लीनता, निज में निज की लीनता ही ब्रह्‌मचर्य व्रत है। आत्म ब्रह्‌म में लीनता ही सर्व-श्रेष्ठ है। पथरिया से पढ़िए, यह खबर…


पथरिया। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील कोल्हापुर ने कहा कि, पट्टाचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज ससंघ का मंगल चातुर्मास विरागोदय तीर्थ पथरिया में चल रहा है। वैभव बडामलहारा ने बताया की विरागोदय तीर्थ पथरिया में पट्टाचार्य विशुद्ध सागरजी ने धर्मसभा में कहा कि- आत्मा में लीनता, निज में निज की लीनता ही ब्रह्‌मचर्य व्रत है। आत्म ब्रह्‌म में लीनता ही सर्व-श्रेष्ठ है।आत्मान्वेषण, आत्म रुचि, शुद्धात्म-लीनता ही उत्कृष्ट ब्रह्‌मचर्य धर्म है। शीलव्रत, ब्र‌ह्मचर्य सर्व-प्रधान अंक के समान है, अन्य व्रत शून्य के समान हैं। ब्रम्हचर्य व्रतों में प्रधान है। ब्रह्मचर्य श्रेष्ठसाधना है। ब्रह्मचर्य सिद्धि का साधन है। ब्रम्हचर्य महानता का व्रत है। ब्रम्हचर्य शूरवीरों का चिह्न है। ब्रह्‌मचर्य उत्तम-साधना है। ब्रह्मचर्य व्रतों में सम्राट है। ब्रह्मचर्य मुक्ति का उपाय है। ब्रह्म-स्वरूप निजात्मा में लीन होना ही ब्रह्मचर्य धर्म है। परम पुण्यात्मा का परिचय है ब्रह्मचर्य। ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ-पुरुषों का गुण है। अब्रह्म, काम-सेवन, वासना, पशु-वृत्ति मानसिक रोग है। अब्रह्‌म अनर्थकारी है। अब्रह्म-सेवन महा-हिंसक है। अब्रम्ह भाव काम-सेवन से शक्ति क्षीण हो जाती है, बुद्धि का क्षय होता है, चेहरे की चमक चली जाती है, पुण्य क्षीण होता है, रुग्नता बढ़ती है, नेत्रों की ज्योति घटती है, बाल सफेद होते हैं, मन चंचल होता है, संताप होता है, तृष्णा जाग्रत होती है, विशुद्धि का ऱ्हास होता है। स्त्री संसर्ग, सरस आहार, शरीर श्रृंगार, गीत-नृत्य, धन संग्रह, रात्रिसंचरण ये अब्रह्‌म के कारण हैं। विषय- कषायों में दुर्भाव को छोड़कर, शीलव्रत धारण करना ब्रम्हचर्य धर्म है। स्त्रियों को पुरुषों से तथा पुरुषों को स्त्रियों के प्रति जो राग दृष्टि उससे प्रेरित होकर जो क्रिया है, यही अशांति का कारण अब्रह्‌म है। इन्द्रिय-विषयों में प्रवृत्ति करना, अब्रह्‌ममान है। संयमित जीवन जीना, पवित्र परिणाम रखना, सम्भोग से विरक्त होना ही ब्रम्हचर्य धर्म है। शीलवान् पुरुषों का सर्वस्व ही ब्रम्हचर्य धर्म है। अन्तर्मुखी दृष्टि, आत्म ब्रम्ह में झाँकना ही ब्रहमचर्य धर्म है। शरीर का प्राण वीर्य है, व्रतों का प्राण शील है। संयम-शील के पालन से नर नारायण बन जाता है। शीलवान के प्रभाव से स्वर्ग के देव भी प्रभावित हो जा जाते हैं। ब्रह्मचर्य के अभाव में सर्व साधनायें व्यर्थ है। ब्रहमचर्य व्रत चिन्तामणि रत्न के सामान महत्त्वपूर्ण है। शीलवन्त की निर्धनता भी आभूषण है। शीलवृत पालो, शिवत्व को प्राप्त करो। शिव बनो, शव मत बनो।धरती पर सबसे बडा परम वीर नहीं है, जो तरुणियों से प्रभावित नहीं होता है।

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