अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने बारह भावना प्रवचन श्रृंखला में नवें दिन धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आस्रव का रखना संवर है। शुभ-अशुभ सभी प्रकार की क्रियाओं को रोकने का नाम भी संवर है। नाव में छेद है। उस छेद में से पानी आता हो और उस छेद को बंद कर दो तो पानी आना बंद हो जाता है। ठीक उसी प्रकार कर्म आने के मन, वचन और काय को नियंत्रण में रखना संवर है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में बारह भावना प्रवचन श्रृंखला के नवें दिन संवर भावना पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री अभिनंदन सागर महाराज के शिष्य अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि आस्रव का रखना संवर है। शुभ-अशुभ सभी प्रकार की क्रियाओं को रोकने का नाम भी संवर है। नाव में छेद है। उस छेद में से पानी आता हो और उस छेद को बंद कर दो तो पानी आना बंद हो जाता है। ठीक उसी प्रकार कर्म आने के मन, वचन और काय को नियंत्रण में रखना संवर है।
मात्र आत्मा का चिंतन करें
मुनि श्री ने कहा कि आप को यह चिंतन करना चाहिए कि अभी तो मैं पाप की क्रियाओं का त्याग कर पुण्य का अर्जन कर रहा था। आपको पुण्य की क्रियाओं को भी छोड़कर मात्र अपनी आत्मा का चिंतन करना है और यह बिना मुनि बने संभव नहीं है। पुण्य की क्रिया भी संसार का कारण है, इसे भी छोड़ना होगा। तभी परमात्मा बन पाएंगे। पुण्य को सोने की बेड़ी और पाप को लोहे की बेड़ी कहा है। बेड़ी छूटे बिना जैसे मनुष्य मुक्त नही हो सकता, उसी तरह पुण्य और पाप की क्रियाओं को छोड़े बिना मुक्त नहीं हो सकते। पहले पाप की क्रिया छोड़नी है फिर पुण्य की क्रिया को धीरे-धीरे छोड़ना है। तभी हम मुक्त हो सकते हैं। पांच महाव्रत, पांच समिति, तीन गुप्ति, दस धर्म, बारह भावना के पालन करने से आस्रव नहीं होता है। इसी का नाम संवर है। संसार में जो भी मोह की दशा में सो रहे हैं, उन्हें जागना होगा, तभी वे चेतना के स्वरूप को पहचान सकते हैं। धर्म सभा में क्षुल्लक अनुश्रमण सागर महाराज जी उपस्थित थे। धर्म सभा का संचालन ब्र. अजय भैया में किया था।













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