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17वें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ जी का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक: इस बार तिथि के अनुसार 28 अप्रैल को मनाया जाएगा


जैन धर्म के 17वें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ जी 28 अप्रैल को जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार यह वैशाख शुक्ल एकम के दिन मनाया जाता है। भगवान कुंथुनाथ जी तीर्थंकर के साथ चक्रवर्ती भी थे। भगवान के जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक पर देश के विभिन्न स्थानों पर स्थित सिद्ध और अतिशय दिगंबर जैन मंदिरों में विशेष धार्मिक कार्यक्रम श्रद्धालुओं द्वारा किए जाएंगे। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत उपसंपादक प्रीतम लखवाल के संयोजन में यह प्रस्तुति पढ़िए….


इंदौर। जैन धर्म के 17वें तीर्थंकर भगवान कुंथुनाथ जी का जन्म, तप और मोक्ष कल्याणक 28 अप्रैल को पूरे देश में पूर्ण आस्था और धार्मिक श्रद्धा से मनाया जाएगा। भगवान कुंथुनाथ जी को का जन्म वैशाख शुक्ल एकम के दिन हुआ था। जैन धर्म के पुराणों के अनुसार भगवान कुंथुनाथ जी सत्रहवें तीर्थंकर हैं। इनका जन्म हस्तिनापुर में हुआ था। पिता का नाम शूरसेन (सूर्य) और माता का नाम श्रीकांता (श्री देवी) था। बिहार में पारसनाथ पर्वत के सम्मेत शिखर पर इन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। प्रभु कुंथुनाथ जी का जन्म वैशाख कृष्ण प्रतिपदा एकम को हस्तिनापुर में हुआ था। प्रभु की देह का रंग स्वर्ण के समान था। प्रभु कुंथुनाथ जी का प्रतीक चिन्ह बककुंरा था। प्रभु शांतिनाथ जी के बाद प्रभु कुंथुनाथ जी दूसरे ऐसे तीर्थंकर थे, जो तीर्थंकर होने के साथ-साथ उसी जन्म में चक्रवर्ती भी थे। प्रभु कुंथुनाथ जी जैन धर्म में वर्णित 12 चक्रवर्तियों में से छटवें चक्रवर्ती थे। प्रभु कुंथुनाथ जी की आयु 95 हजार वर्ष थी और प्रभु की देह का आकार 35 धनेश्वर का था। प्रभु कुंथुनाथ जी ने वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन दीक्षा ग्रहण की तथा 16 वर्ष तक कठोर साधना की।

16 वर्षों के प्रभु को चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन निर्मल कैवल ज्ञान की प्राप्ति हो गई। इसके बाद भी प्रभु ने चार तीर्थ की स्थापना और स्वयं तीर्थंकर बन गए। प्रभु ने सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह आदि का चतुर्याम धर्म का उपदेश दिया। प्रभु का संघ बहुत विशाल था। प्रभु के संघ में 35 गणधर थे। जिनमे से स्वयंभू नाम के गणधर प्रथम थे। प्रभु के यक्ष का नाम गंधर्व तथा यक्षिणी का नाम बाला (जयदेवी) था। प्रभु ने अपनी आयुष पूर्ण कर वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन अपने समस्त कर्मों का क्षयकर सम्मेद शिखरजी से निर्वाण प्राप्त किया था।

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