तीर्थंकर भगवान श्री पुष्पदंत जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस वर्ष 21 नवंबर को मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में इस दिन विशेष पूजा-अर्चना और आराधना की जाएगी। भगवान श्री पुष्पदंत जी का जन्म एवं तप कल्याणक मार्गशीर्ष शुक्ल एकम को आता है। तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत को सुविधिनाथ भी कहा जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। तीर्थंकर भगवान श्री पुष्पदंत जी का जन्म एवं तप कल्याणक इस वर्ष 21 नवंबर को मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में इस दिन विशेष पूजा-अर्चना और आराधना की जाएगी। भगवान श्री पुष्पदंत जी का जन्म एवं तप कल्याणक मार्गशीर्ष शुक्ल एकम को आता है। जैन धर्म ग्रंथों में वर्णित आलेखन के अनुसार जैन धर्म में तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत, जिन्हें सुविधिनाथ भी कहा जाता है। वर्तमान युग ( अवसर्पिणी ) के नौवें तीर्थंकर थे। जैन मान्यता के अनुसार, वे सिद्ध और अरिहंत बन गए। एक मुक्त आत्मा जिसने अपने सभी कर्मों का नाश कर दिया था। श्री पुष्पदंत भगवान का जन्म इक्ष्वाकु वंश के काकंदी (आधुनिक खुखुंदू, देवरिया, उत्तरप्रदेश ) में राजा सुग्रीव और रानी रामादेवी के यहां हुआ था। उन्होंने ऋषभनाथ भगवान द्वारा शुरू की गई परंपरा में चार-भाग वाले संघ को फिर से स्थापित किया। पुष्पदंत प्रभु मगरमच्छ प्रतीक, मल्ली वृक्ष, अजिता यक्ष और महाकाली (दिग्गज) और सुतारका (श्वेत) यक्षी से जुड़े हैं। उनकी ऊंचाई 100 धनुष बताई गई है। किवदंती है कि वह 20 लाख पूर्वा तक जीवित रहे। किवदंती यह भी है कि पुष्पदंत का जन्म उनके पूर्ववर्ती चंद्रप्रभा से 90 करोड़ सागर बाद हुआ था। उनके उत्तराधिकारी शीतलनाथ का जन्म उनसे 9 करोड़ सागर बाद हुआ था। भगवान पुष्पदंत जी ने मार्गशीर्ष शुक्ल एकम को दीक्षा ली और चार महीने की तपस्या के बाद सम्मेद शिखर पर साल वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान प्राप्त किया। उनके यक्ष का नाम ब्रह्मा और यक्षिणी का ना huम काली था।













Add Comment