जैन धर्म के छठवें तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 19 अक्टूबर को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को उनका जन्म एवं तप कल्याणक पूरे देश में धूमधाम और श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के छठवें तीर्थंकर भगवान पद्मप्रभ जी का जन्म एवं तप कल्याणक 19 अक्टूबर को मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को उनका जन्म एवं तप कल्याणक पूरे देश में धूमधाम और श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया जाता है। जिनालयों में भगवान का अभिषेक और शांतिधारा के साथ अष्टद्रव्य से अर्घ्य आदि विधि अनुसार पूजन किया जाता है। भगवान पद्मप्रभ जी का जन्म कौशाम्बी में राजा धर और रानी सुसीमा के यहां कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को हुआ था। उन्होंने कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को ही एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ली थी। जिससे उनका तप कल्याणक कहलाता है। भगवान पद्मप्रभ जी को हाथी की दशा सुनकर मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। वे एक पालकी पर बैठकर मनोहर वन में गए और दीक्षा ग्रहण की। जैन धर्म के ग्रंथों के अनुसार भगवान का नामकरण का कारण भी उल्लेखित किया गया है।
इसमें बताया गया कि उनका मुख कमल के समान सुंदर और चमकीला था, इसलिए उनका नाम पद्मप्रभ रखा गया। भगवान पद्मप्रभ जी ने एक हजार अन्य राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण कर इस जगत में जैन धर्म की ध्वजा को स्थापित किया। उनके बताए संदेश, उपदेश, ज्ञान आदि समाजोत्थान में काफी मददगार रहे। भगवान के जन्म कल्याणक पर हर शहर में भव्य और दिव्य आयोजनों में भक्ति आराधना होती है।













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