तीर्थंकर आदिनाथ के जन्म व दीक्षा कल्याणक महोत्सव पर आयोजित धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए सलाहकार दिनेश मुनि ने कहा कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने न केवल आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि मानव सभ्यता को एक सुसंस्कृत और संगठित रूप देने में भी अतुलनीय योगदान दिया। पढ़िए लुधियाना की यह पूरी खबर…
लुधियाना। सिविल लाइंस स्थित एस एस जैन सभा, जैन स्थानक में प्रथमेश आदिसृष्टि तीर्थंकर आदिनाथ के जन्म व दीक्षा कल्याणक महोत्सव पर आयोजित धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए सलाहकार श्री दिनेश मुनि ने कहा कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ, जिन्हें ऋषभनाथ, ऋषभदेव या आदिनाथ के नाम से जाना जाता है, उन्होंने न केवल आध्यात्मिक मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि मानव सभ्यता को एक सुसंस्कृत और संगठित रूप देने में भी अतुलनीय योगदान दिया।
कर्म, कर्तव्य और कला के संस्थापक
संसार में कर्म, कर्तव्य और कला का संस्थापक माना जाता है। क्योंकि उन्होंने मानव जीवन को जीने की कला, सामाजिक व्यवस्था की नींव, और विभिन्न व्यावहारिक कौशलों का ज्ञान प्रदान किया। ग्रंथों में भगवान आदिनाथ को एक ऐसे युग-प्रवर्तक के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने उस समय के असंगठित और अज्ञानी समाज को सभ्यता की ओर अग्रसर किया। सलाहकार दिनेश मुनि ने आगे कहा कि समाज में स्त्री शिक्षा के महत्व को स्थापित करने के लिए तीर्थंकर आदिनाथ ने अपनी पुत्री ब्राह्मी को लिपि लिखने का एवं सुन्दरी को इकाई, दहाई आदि अंक विद्या भी सिखाई।
वर्ण व्यवस्था का उपदेश भी दिया
समारोह में डॉ दीपेन्द्र मुनि (दसवां वर्षीतप-उपवास) व डॉ पुष्पेंद्र मुनि के (दसवां वर्षीतप-एकासन) को बधाई दी गई व मंगल गीतों से श्रोताओं ने दोनों तपस्वी संतों के नाम जयघोष से वातावरण गुंजायमान किया। नवकार महामंत्र व ऊं श्री आदिनाथायः नमः के मंत्रोच्चार से प्रारंभ हुए समारोह में डॉ दीपेन्द्र मुनि ने कहा कि तीर्थंकर आदिनाथ ने सामाजिक व्यवस्था के संचालन के लिए नगर, गांव, मकान आदि बनाने और उन्हें बसाने का उपदेश दिया था। इसी के साथ उन्होंने वर्ण व्यवस्था का उपदेश भी दिया। उन्होंने वर्ण व्यवस्था की स्थापना प्रजा के कार्य के अनुसार की थी।
“यादों में है आदिनाथ” भजन की शानदार प्रस्तुति
श्रमण डॉ पुष्पेंद्र ने इस अवसर पर कहा कि भगवान आदिनाथ ने जीवन में पुरुषार्थ करने और विभिन्न विद्याओं व कलाओं के माध्यम से जीवन को व्यवस्थित ढंग से जीने का उपदेश दिया। वास्तव में भगवान आदिनाथ ने ही जीविकोपार्जन के सिद्धांतो से जनता को अवगत करवाया था। बहिन अंजली मुकेश जैन ने “यादों में है आदिनाथ” भजन प्रस्तुत किया। समारोह में विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए।
समाजजनों व धर्म प्रेमियों की उपस्थिति दर्शनीय रहीं
कार्यक्रम में लड्डू की प्रभावना नीरू विजय जैन (जैन पैकवेल) परिवार द्वारा दी गई व सभा द्वारा श्रद्धालुओं की गौतम प्रसादी रखी गयी। समारोह का संचालन सभा के मंत्री प्रमोद जैन ने किया। समारोह में मानव रत्न रामकुमार जैन, जैन कान्फ्रेंस पंजाब शाखा के अध्यक्ष अनिल जैन, आत्म गद्दी के महामंत्री दीपांशु जैन, मेरठ से हिम्मत बागरेचा, अंबाला से अशोक बंसल, मलेरकोटला से दर्शन कुमार जैन, अभिषेक जैन, सुंदर नगर सभा से अभय जैन, महिला मंडल से अनीता जैन, इसके अलावा आत्म नगर, शिवपुरी, अग्र नगर, इत्यादि सभाओं से धर्म प्रेमियों की उपस्थिति रही ।
यह होता है वर्षी तप
जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने एक साल तक घोर तपस्या की। इस दौरान उन्होंने अन्न व जल का पूर्णतरू त्याग कर दिया। एक वर्ष के पश्चात भगवान ने गन्ने के रस से ऋषभदेव का व्रत खुलवाया। ढाई हजार साल पुरानी इसी मान्यता के आधार पर आज भी जैन भक्त एक दिन उपवास व एक दिन भोजन का विधान रखते हुए 365 दिन का अनुष्ठान करते हैं। इसमें सूर्यास्त के बाद भोजन व पानी ग्रहण करना वर्जित है।













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